
राजवार्तिक :
1-2. 'उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्' और 'गुणपर्ययवद् द्रव्यम्' इन लक्षणों से युक्त होने के कारण आकाश आदि की तरह काल भी द्रव्य है । काल में ध्रौव्य तो स्वप्रत्यय ही है क्योंकि वह स्वस्वभाव में सदा व्यवस्थित रहता है । व्यय और उत्पाद अगुरुलघुगुणों की वृद्धि-हानि की अपेक्षा स्वप्रत्यय हैं तथा पर द्रव्यों में वर्तनाहेतु होने से परप्रत्यय भी हैं । काल में अचेतनत्व, अमूर्तत्व, सूक्ष्मत्व, अगुरुलघुत्व आदि साधारण गुण और वर्तनाहेतुत्व असाधारण गुण पाये जाते हैं । व्यय और उत्पाद रूप पर्यायें भी काल में बराबर होती रहती हैं । अतः वह द्रव्य है। |