
राजवार्तिक :
1-3 निर्वर्तना आदि शब्द कर्मसाधन और भावसाधन दोनों हैं। जब निर्वर्तना आदि शब्द कर्मसाधन हैं तब 'निर्वर्तना ही अधिकरण' ऐसा सामानाधिकरण्य रूप से अधिकरण शब्द का सम्बन्ध कर लेना चाहिए। जिस समय भावसाधन होते हैं तब 'विशिष्यन्ति' क्रिया का अध्याहार करके 'निर्वर्तना आदि भाव पर अधिकरण को विशिष्ट करते हैं' ऐसा भिन्नाधिकरण रूप से अधिकरण शब्द का सम्बन्ध कर लेना चाहिए। निर्वर्तना-उत्पत्ति, निसर्ग-स्थापना, संयोगमिलाना और निसर्ग-प्रवृत्ति । 'द्वि चतुर आदि हैं भेद जिसके' ऐसा द्वन्द्वगर्भ बहुव्रीहि समास 'द्विचतुर्द्वित्रिभेदाः' में समझना चाहिए। 4-11. प्रश्न – इस सूत्र में 'पर' शब्द निरर्थक है क्योंकि पहिले सूत्र में 'आद्य' शब्द देने से अर्थात् ही यह 'पर' सिद्ध हो जाता है या फिर प्रथम सूत्र में 'आद्य' शब्द व्यर्थ है क्योंकि सारा प्रयोजन अर्थापत्ति से सिद्ध हो जाता है। अर्थापत्ति को अनैकान्तिक कहना उचित नहीं है क्योंकि 'अहिंसा धर्म है' यह कहने से जिस प्रकार 'हिंसा अधर्म है' यह सिद्ध होता ही है उसी तरह मेघ के अभाव में वृष्टि नहीं होती' यह कहने से 'मेघ के होने पर वृष्टि होती है' यह भी सिद्ध होता ही है। कभी मेघ के होने पर भी वृष्टि के न देखे जाने से इतना ही कह सकते हैं कि वृष्टि 'मेघ के होने पर ही होगी' अभाव में नहीं। 'पर शब्द यदि न दिया जायगा तो यह सूत्र असम्बद्ध हो जायगा' यह भी समाधान ठीक नहीं है क्योंकि यहाँ कोई निवर्त्य नहीं है। आद्य जीवाधिकरण का तो संरम्भ आदि से सम्बन्ध हो ही गया है। अतः परिशेष न्याय से ये अजीवाधिकरण हो ही जाते हैं। पर शब्द को प्रकृष्टवाची कहना भी ठीक नहीं है क्योंकि जीवाधिकरण निकृष्ट तो है नहीं जिसका प्रकृष्ट अजीवाधिकरण से वारण किया जाय । इसी तरह पर शब्द को 'पर धाम को गये' अर्थात् इष्ट धाम को गये इसकी तरह इष्टवाची भी नहीं कह सकते क्योंकि यहाँ अनिष्ट क्या है जिसकी निवृत्ति के लिए पर शब्द को इष्टवाची कहा जाय ? उत्तर – पर शब्द भिन्नार्थक है अर्थात् संरम्भ आदि से निर्वर्तना आदि भिन्न हैं। अन्यथा निर्वर्तना को भी आत्मपरिणामरूपता आ जाने से जीवाधिकरणत्व का प्रसंग प्राप्त होता। अथवा, पहिले कह दिया है कि आद्य की तरह 'पर' शब्द भी स्पष्ट अर्थबोध कराने के लिए है। 12. पाँच प्रकार के शरीर, वचन, मन और श्वासोच्छ्वास मूलगुण निर्वर्तना हैं और काष्ठ, पुस्तक, चित्रकर्म आदि उत्तरगुण निर्वर्तना हैं। 13. अप्रत्यवेक्षित, दुष्प्रमृष्ट, सहसा और अनाभोग के भेद से निक्षेप चार प्रकार का है। 14. भक्तपानसंयोग और उपकरणसंयोग के भेद से संयोग दो प्रकार का है। 15. मन वचन और काय के भेद से निसर्ग तीन प्रकार का है। |