+ ज्ञान-दर्शनावरण के आस्रव -
तत्प्रदोष-निह्नव-मात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञान-दर्शनावरणयो: ॥10॥
अन्वयार्थ : ज्ञान और दर्शन के विषय में प्रदोष, निह्नव, मात्सर्य, अन्तराय, आसादन और उपघात ये ज्ञानावरण और दर्शनावरण के आस्रव हैं ॥१०॥
Meaning : Spite against knowledge, concealment of knowledge, non-imparting of knowledge out of envy, causing impediment to acquisition of knowledge, disregard of knowledge, and disparagement of true knowledge, lead to the influx of karmas which obscure knowledge and perception.

  सर्वार्थसिद्धि    राजवार्तिक 

सर्वार्थसिद्धि :

तत्त्वज्ञान मोक्ष का साधन है उसका गुणगान करने पर उस समय नहीं बोलनेवाले के जो भीतर पैशुन्यरूप परिणाम होता है वह प्रदोष है ।

किसी कारण से 'ऐसा नहीं है, मैं नहीं जानता' ऐसा कहकर ज्ञान का अपलाप करना निह्नव है ।

विज्ञान का अभ्यास किया है वह देने योग्य भी है तो जिस कारण से वह नहीं दिया जाता है वह मात्सर्य है ।

ज्ञान का विच्छेद करना अन्तराय है ।

दूसरा कोई ज्ञान का प्रकाश कर रहा हो तब शरीर या वचन से उसका निषेध करना आसादन है ।

प्रशंसनीय ज्ञान में दूषण लगाना उपघात है ।

शंका – उपघात का जो लक्षण किया है उससे वह आसादन ही ज्ञात होता है ?

समाधान –
प्रशस्त ज्ञान की विनय न करना, उसकी अच्छाई की प्रशंसा न करना आदि आसादन है । परन्तु ज्ञान को अज्ञान समझकर ज्ञान के नाश का इरादा रखना उपघात है इस प्रकार इन दोनों में अन्तर है । सूत्रमें 'तत्' पद ज्ञान और दर्शन का निर्देश करने के लिए दिया है ।

शंका – ज्ञान और दर्शन अप्रकृत हैं, तथा उनका निर्देश भी नहीं किया है, फिर यहाँ 'तत्' शब्द के द्वारा उनका ज्ञान कैसे हो सकता है ?

समाधान –
प्रश्न की अपेक्षा अर्थात् ज्ञानावरण और दर्शनावरण का क्या आस्रव है ऐसा प्रश्न करने पर उसकी अपेक्षा 'तत्' शब्द ज्ञान और दर्शन का निर्देश करता है । इससे यह अभिप्राय निकला कि ज्ञान और दर्शनवालों के विषय में तथा उनके साधनों के विषय में प्रदोषादिक की योजना करनी चाहिए, क्योंकि ये उनके निमित्तसे होते हैं । ये प्रदोषादिक ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म के आस्रव के कारण हैं । एक कारण से भी अनेक कार्य होते हुए देखे जाते हैं, इसलिए प्रदोषादिक के एक समान रहते हुए भी इनसे ज्ञानावरण और दर्शनावरण दोनों का आस्रव सिद्ध होता है । अथवा विषय के भेद से आस्रवमें भेद होता है । ज्ञान-सम्बन्धी प्रदोषादिक ज्ञानावरणके आस्रव हैं और दर्शनसम्बन्धी प्रदोषादिक दर्शनावरणके आस्रव हैं ।

जिस प्रकार इन दोनों कर्मों का आस्रव अनेक प्रकार का है उसी प्रकार-
राजवार्तिक :

1-7. ज्ञान-कथा के समय मुँह से कुछ न कहकर भीतर-ही भीतर ईर्ष्या के परिणाम होना प्रदोष है। किसी बहाने से 'नहीं है, नहीं जानता' इत्यादि रूप से ज्ञान का लोप करना निह्नव है। देने योग्य ज्ञान को भी किसी बहाने से न देना मात्सर्य है। कलुषता से ज्ञान का व्यवच्छेद करना अन्तराय है। दूसरे के द्वारा प्रकाशित ज्ञान का काय या वचन के द्वारा वृर्जन करना आसादन है। बुद्धि और हृदय की कलुषता से प्रशस्त ज्ञान में दूषण लगाना उपघात है। आसादन में विद्यमान ज्ञान का विनय, प्रकाशन, गुणकीर्तन आदि न करके अनादर किया जाता है और उपघात में ज्ञान को अज्ञान ही कहकर ज्ञान का नाश किया जाता है।

8-9. तत् शब्द से ज्ञान और दर्शन का ग्रहण किया जाता है अर्थात् ज्ञान और दर्शन के प्रदोष, निह्नव आदि ज्ञानावरण और दर्शनावरण के आस्रव के कारण होते हैं । 'ज्ञानदर्शनावरणयोः' कहने से ज्ञात होता है कि प्रदोष आदि ज्ञान और दर्शन सम्बन्धी हैं। इसी तरह ज्ञान दर्शनवालों के प्रदोष आदि और ज्ञानदर्शन के साधनों के प्रदोष आदि भी 'तत्प्रदोष' शब्द से ग्रहण कर लेने चाहिये।

10-11. प्रश्न – ज्ञानावरण और दर्शनावरण के आस्रव के कारण तुल्य हैं अतः दोनों को एक ही कहना चाहिए। जिनके कारण तुल्य होते हैं वे एक होते हैं।

उत्तर –
तुल्य कारण होने से कार्यक्य माना जाय तो जब वचन के कारण कण्ठ, ओंठ आदि तुल्य हैं तो प्रत्येक वचन को या तो साधक होना चाहिए या दूषक ही। इस तरह स्व-वचनविरोध ही हो जायगा। यदि एक हेतु के होने पर भी वचन स्वपक्ष के ही साधक तथा परपक्ष के ही दूषक होते है तो 'तुल्यहेतु होने से कार्यक्य होता है' इस वचन का विरोध हो जायगा। इस पक्ष में दृष्ट और आगम दोनों से ही विरोध आता है। एक मिट्टी के पिण्ड से ही घट, घटी, शराव, उदञ्चन-सकोरा आदि अनेक कार्यों की प्रत्यक्षसिद्धि है।
  • सांख्य एक प्रधान से महान अहंकार आदि नाना कार्य मानते हैं।
  • बौद्ध उत्पत्ति अविद्या रूप प्रत्यय से पुण्य-अपुण्य और अनुभय संस्कारों की उत्पत्ति मानते हैं।
  • वैशेषिक चतुष्टय सन्निकर्ष से रूपादि ज्ञान आदि नाना कार्यों की उत्पत्ति मानते हैं ।
इस तरह सभी के आगमविरोध दोष का प्रसंग होता है।

12-16. आवरण के अत्यन्त संक्षय होने पर केवलज्ञान और केवलदर्शन सूर्य के प्रताप और प्रकाश की तरह प्रकट हो जाते हैं अतः इनमें तुल्य कारणों से आस्रव मानना उचित है। सावरण व्यक्ति के ज्ञान और दर्शन की क्रमशः प्रवृत्ति होती है। जैसे गरम जल में वर्तमान अग्नि का ताप प्रकट है प्रकाश प्रकट नहीं है और प्रदीप के प्रकाश में प्रकाश प्रकट है प्रताप प्रकट नहीं है उसी तरह छद्मस्थ के जब ज्ञानोपयोग होता है तब दर्शनोपयोग नहीं होता और जब दर्शनोपयोग होता है तब ज्ञानोपयोग नहीं। जैसे मेघपलट के हटने पर सूर्य का जहाँ प्रकाश है वहाँ प्रताप है और जहाँ प्रताप है वहाँ प्रकाश है उसी तरह निरावरण अचिन्त्य-माहात्म्यशाली केवलीसूर्य के समस्त विषयक ज्ञान और दर्शन होते हैं, जहाँ ज्ञान है वहाँ दर्शन है और जहाँ दर्शन है वहाँ ज्ञान है अतः यह शंका निर्मूल हो जाती है कि - "ज्ञान अस्पृष्ट और अविषय में भी प्रवृत्ति करता है पर दर्शन स्पृष्ट और विषय में ही चूँकि अतीत और अनागत विनष्ट और अनुत्पन्न होने से स्पृष्ट और विषय नहीं हो सकते अतः तद्विषयक ज्ञान ही हो सकता है दर्शन नहीं। अतः केवली को अतीतानागतदर्शी नहीं कह सकते"; जैसे केवली असद्भुत और अनुपदिष्ट को जानते हैं उसी तरह देखते भी हैं इसमें क्या बाधा है ? जैसे सावरण को अस्पृष्ट और अविषय में बिना उपदेश के ज्ञान नहीं होता क्या उसी तरह केवली को भी मानते हो ? यदि नहीं, तो जैसे सावरण व्यक्ति को स्पृष्ट और विषय में दर्शन होता है उस तरह केवली के नहीं माना जा सकता। अतः केवली को त्रिकालगोचर दर्शन मानना उचित है।

17. यद्यपि अवधिज्ञानीक आवरण है फिर भी अवधिदर्शनावरण का क्षयोपशम अन्य कारणों की अपेक्षा नहीं करता अतः बिना उपदेश के ही अवधिदर्शन की केवल दर्शन की तरह अतीत और अनागत में भी प्रवृत्ति होती है अतः अस्पृष्ट और अविषय का भी अवधिदर्शन सिद्ध है।

18-19. चूंकि चार ही दर्शनावरण बताये हैं, इस लिए मनःपर्यय दर्शनावरण का क्षयोपशमरूप निमित्त न होने से मनःपर्यय दर्शन नहीं होता । मनःपर्ययज्ञान अवधिज्ञान की तरह स्वमुख से विषयों को नहीं जानता किन्तु परकीय मनप्रणाली से जानता है । अतः मन जैसे अतीत और अनागत अर्थों का विचार-चिन्तन तो करता है. देखता नहीं है उसी तरह मनःपर्ययज्ञानी भी भूत और भविष्यत् को जानता है, देखता नहीं । वह वर्तमान भी मन को विषयविशेषाकार से जानता है अतः सामान्यावलोकन पूर्वक प्रवृत्ति न होने से मनःपर्ययदर्शन नहीं बनता।

20. अथवा, ज्ञानावरण और दर्शनावरण के आस्रव के कारण भिन्न-भिन्न ही समझने चाहिए क्योंकि विषयभेद से प्रदोष आदि भिन्न हो जाते हैं। ज्ञानविषयक प्रदोष आदि ज्ञानावरण के और दर्शनविषयक प्रदोष आदि दर्शनावरण के आस्रव के कारण होते हैं। इसी तरह आचार्य और उपाध्याय के प्रतिकूल चलना, अकाल अध्ययन, अश्रद्धा, अभ्यास में आलस्य करना, अनादर से अर्थ सुनना, तीर्थोपरोध-दिव्यध्वनि के समय स्वयं व्याख्या करने लगना, बहुश्रुतपने का गर्व, मिथ्योपदेश, बहुश्रुत का अपमान करना, स्वपक्ष का दुराग्रह, स्वपक्ष के दुराग्रहवश असम्बद्ध प्रलाप करना, सूत्रविरुद्ध बोलना, असिद्ध से ज्ञान प्राप्ति, शास्त्रविक्रय और हिंसा आदि ज्ञानावरण के आस्रव के कारण हैं । दर्शनमात्सर्य, दर्शनअन्तराय, आँखें फोड़ना, इन्द्रियों के विपरीत प्रवृत्ति, दृष्टि का गर्व, दीर्घ-निद्रा, दिन में सोना, आलस्य, नास्तिकता, सम्यग्दृष्टि में दूषण लगाना, कुतीर्थ की प्रशंसा, हिंसा और यतिजनों के प्रति ग्लानि के भाव आदि भी दर्शनावरण के आस्रव के कारण है। इस तरह इनके आस्रव के कारणों में भेद है।