+ असाता वेदनीय कर्म के आस्रव -
दु:ख-शोक-तापाक्रन्दन-वध-परिदेवनान्यात्म-परोभय-स्थानान्यसद्वेद्यस्य ॥11॥
अन्वयार्थ : अपने में, दूसरे में या दोनों में विद्यमान दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन ये असाता वेदनीय कर्म के आस्रव हैं ॥ ११ ॥
Meaning : Suffering, sorrow, agony, moaning, injury, and lamentation, in oneself, in others, or in both, lead to the influx of karmas which cause unpleasant feeling.

  सर्वार्थसिद्धि    राजवार्तिक 

सर्वार्थसिद्धि :

पीड़ारूप आत्माका परिणाम दुःख है ।

उपकार करने वाले का सम्बन्ध टूट जाने पर जो विकलता होती है वह शोक है ।

अपवाद आदि के निमित्त से मन के खिन्न होने पर जो तीव्र अनुशय-संताप होता है वह ताप है ।

परिताप के कारण जो आँसू गिरने के साथ विलाप आदि होता है, उससे खुलकर रोना आक्रन्दन है ।

आयु, इन्द्रिय, बल और श्वासोच्छ्वास का जुदा कर देना वध है ।

संक्लेशरूप परिणामों के होने पर गुणों का स्मरण और प्रशंसा करते हुए अपने और दूसरे के उपकार की अभिलाषा से करुणाजनक रोना परिदेवन है ।

शंका – शोकादिक दुःख के भेद हैं, इसलिए दुःख का ग्रहण करना पर्याप्त है ?

समाधान –
यह कहना सही है तो भी यहाँ कुछ भेदों का कथन करके दुःख की जातियाँ दिखलायी हैं । जैसे गौ ऐसा कहने पर अवान्तर भेदों का ज्ञान नहीं होता, इसलिए खांडी, मुंडी, काली, सफेद आदि विशेषण दिये जाते हैं उसी प्रकार दुःखविषयक आस्रव असंख्यात लोकप्रमाण संभव हैं । परन्तु दुःख इतना कहने पर सब भेदों का ज्ञान नहीं होता अतएव कुछ भेदों का उल्लेख करके उनको पृथक्-पृथक् जान लिया जाता है । क्रोधादिक के आवेशवश ये दुःखादिक कभी अपने में होते हैं, कभी दूसरों में होते हैं और कभी दोनों में होते हैं । ये सब असाता वेदनीय के आस्रव के कारण जानने चाहिए ।

शंका – यदि अपने में, पर में या दोनों में स्थित दुःखादिक असातावेदनीय के आस्रव के कारण हैं तो अरिहंत के मत को मानने वाले मनुष्य दुःख को पैदा करने वाले केशलोंच, अनशन और आतपस्थान (आतापनयोग) आदि में क्यों विश्वास करते हैं और दूसरों को इनका उपदेश क्यों देते हैं ?

समाधान –
यह कोई दोष नहीं है ; क्योंकि अन्तरंग में क्रोधादिक के आवेश से जो दुःखादिक पैदा होते हैं वे असातावेदनीय के आस्रव के कारण हैं इतना यहाँ विशेष कहा है । जैसे अत्यन्त दयालु किसी वैद्य के फोड़े की चीर-फाड़ और मरहमपट्टी करते समय निःशल्य संयत को दुःख देने में निमित्त होने पर भी केवल बाह्य निमित्त मात्रसे पापबन्ध नहीं होता उसी प्रकार जो भिक्षु संसार-सम्बन्धी दुःखसे उद्विग्न है और जिसका मन उसके दूर करने के उपायों में लगा हुआ है उसके शास्त्रविहित कर्म में प्रवृत्ति करते समय संक्लेशरूप परिणामों के नहीं होने से पापबन्ध नहीं होता । कहा भी है - “ जिस प्रकार चिकित्सा के साधन न स्वयं दुःखरूप देखे जाते हैं और न सुखरूप, किन्तु जो चिकित्सा में लग रहा है उसे दुःख भी होता है और सुख भी । उसी प्रकार मोक्ष-साधन के जो हेतु हैं वे स्वयं न दुःखरूप हैं और न सुखरूप किन्तु जो मोक्षमार्ग पर आरूढ़ है उसे दुःख भी होता है और सुख भी ।”

असातावेदनीय के आस्रव के कारण कहे, परन्तु सातावेदनीय के आस्रव के कारण कौन हैं ? इसी बात को बतलाने के लिए अब आगे का सूत्र कहते हैं -
राजवार्तिक :

1-8. विरोधी पदार्थों का मिलना, इष्ट का वियोग, अनिष्टसंयोग और निष्ठुर वचन आदि बाह्य कारणों की अपेक्षा से तथा असाता वेदनीय के उदय से होने वाला पीडा-लक्षण परिणाम दुःख है । अनुग्रह करनेवाले बन्धु आदि से विच्छेद हो जाने पर उसका बार-बार विचार करके जो चिन्ता, खेद और विकलता आदि मोह-कर्मविशेष-शोक के उदय से होते हैं वे शोक हैं । परिभवकारी कठोरवचन के सुनने आदि से कलुष चित्तवाले व्यक्ति के जो भीतर-ही-भीतर तीव्र जलन या अनुशयपरिणाम होते हैं वे ताप हैं । परिताप के कारण अश्रुपात अंगविकार-माथा फोड़ना, छाती कूटना आदि पूर्वक जो रोना है वह आक्रन्दन है । आयु, इन्द्रिय, बल और प्राण आदि का विघात करना वध है। अतिसंक्लेशपूर्दक ऐसा रोना-पीटना जिसे सुनकर स्वयं अपने तथा दूसरे को दया आ जाय, परिदेवन है । यद्यपि ये सभी दुखाजातीय हैं; क्योंकि दुःख के ही असंख्यात भेद होते हैं, फिर भी यहाँ कुछ मुख्य-मुख्य भेदों का निर्देश कर दिया है। जैसे कि गौ असंख्य प्रकार की होती हैं और केवल गौ कहने से सबका ज्ञान नहीं हो पाता अतः खण्डी, मुण्डी, शाबलेय आदि कुछ विशेष दिखा दिये जाते हैं। अथवा, जैसे मृत्पिण्ड, घट, कपाल आदि मूर्तिमान रूपीद्रव्य की दृष्टि से एक होकर भी प्रतिनियत आकार आदि पर्यायार्थिक दृष्टि से भिन्न हैं उसी तरह अप्रीतिसामान्य की दृष्टि से दुःखादि में एकत्व होनेपर भी विभिन्न कारणों से उत्पन्न और अभिव्यक्त पर्यायों की दृष्टि से वे जुदा-जुदा हैं।

9. जिस समय पर्याय और पर्यायी की अभेद विवक्षा होती है उस समय गरमलोह-पिण्ड की तरह तप से परिणमन करने के कारण आत्मा ही दुःखयति-दुःख आदिरूप होती है, अतः दुःखादि शब्द कर्तृसाधन में निष्पन्न होते हैं और जब पर्याय और पर्यायी की भेदविवक्षा होती है तब दुःखादि शब्द 'दुःख हो जिसके द्वारा या जिसमें' अथवा 'दुःखनमात्र दुःख' इस प्रकार करणसाधन और भावसाधन होते हैं।

10. सर्वथा एकान्त-पक्ष में दुःख आदि की कर्ता आदि साधनों में व्युत्पत्ति नहीं बन सकती; क्योंकि इसमें दूसरे पक्ष का संग्रह नहीं हो पाता । यदि पर्यायमात्र ही माना जाय और आत्मद्रव्य की सत्ता न मानी जाय तो विज्ञान आदि में 'करण' व्यवहार ही नहीं हो सकता; क्योंकि कोई कर्ता ही नहीं है। स्वातन्त्र्य-शक्तिविशिष्ट कर्ता की अपेक्षा ही शेष कर्म करण आदि कारक बनते हैं। कर्ता के अभाव में उनका भी अभाव हो जायगा। कर्तृसाधनता भी नहीं बनती; क्योंकि यहाँ करण आदि सहकारियों की अपेक्षा नहीं है । विज्ञान आदि जब युगपत् उत्पन्न होते हैं तो दायें-बायें सींग की तरह परस्पर सहकारिभाव नहीं बन सकता । अतीत और अनागत चूँकि असत् हैं, अतः उनका भी वर्तमान के प्रति सहकारिभाव नहीं हो सकता। जब विज्ञान आदि क्षणिक हैं तो पूर्वानुभूत की स्मृति आदि नहीं होंगी, और तब पूर्वविनष्ट अर्थ के विचार से होनेवाले शोक आदि कैसे होंगे ? क्षणिकवाद में स्मृति आदि तो हो ही नहीं सकते । सन्तान अवस्तु है अतः उसकी अपेक्षा भी स्मरणादि की कल्पना नहीं जमती। भाववान् के बिना भावसाधन की बात करना भी निरर्थक ही है।

यदि द्रव्यमात्र ही स्वीकार किया जाता है, उसमें क्रिया या गुण आदि परिणमन नहीं होते, वह सर्वथा निर्गुण और निष्क्रिय है तो सुख-दुःख आदि पर्यायों के प्रति कर्ता कैसे हो सकता है ? इसी तरह अचेतन प्रधान भी दुःख आदि पर्यायों का कर्ता नहीं हो सकता; क्योंकि घटादि अचेतनों में दुःख आदि नहीं देखे जाते । यदि अचेतन में भी सुख-दुःख आदि माने जायँ तो चेतन और अचेतन में कुछ अन्तर ही नहीं रहेगा। निष्क्रिय द्रव्य के अधर्मनिमित्तक दुःख आदि की कल्पना भी ठीक नहीं है क्योंकि निष्क्रिय द्रव्य के धर्म और अधर्म की उत्पत्ति नहीं हो सकती और न उसके कर्मफल का अनुभव ही हो सकता है।

11. ये दुःखादि क्रोधादि के आवेश के कारण आत्मा पर और उभय में होते हैं। जब क्रोधादि से आविष्ट आत्मा अपने में दुःख आदि उत्पन्न करता है तब वे आत्मस्थ होते हैं और जब समर्थ व्यक्ति पर में दुख आदि उत्पन्न करता है तब वे परस्थ होते हैं और जब साहुकार कर्जदार से ऋण वसूल करने जाते हैं तब दोनों को ही भूख-प्यास आदि के कारण दुःख आदि होते हैं तब ये उभयस्थ होते हैं।

12-13. विद्, विद्लृ, विन्ति और विद्यति ये चार विद् धातुएँ क्रमशः ज्ञान, लाभ, विचार और सद्भाव अर्थ को कहती हैं। यहाँ चेतनार्थक विद् धातु से चुरादिण्यन्त प्रत्यय करके वेध शब्द बना है। अनिष्ट-फल उत्पन्न करने के कारण वह अप्रशस्त है, अतः असद्वेद्य कहा जाता है।

14-15. प्रधान होने से दुःख का ग्रहण सर्वप्रथम किया है, शेष शोक आदि इसी के विकल्प हैं। शोकादि का ग्रहण दुःख के विकल्पों के उपलक्षणरूप है, अतः अन्य विकल्पों का भी संग्रह हो जाता है। अतः अशुभप्रयोग, परपरिवाद, पैशुन्यपूर्वक अनुकम्पाभाव, परपरिताप, अंगोपांगच्छेद, भेद, ताडन, त्रासन, तर्जन, भर्त्सन, तक्षण, विशंसन, बन्धन, रोधन, मर्दन, दमन, वाहन, विहेडन, ह्वेपण, शरीर को रूखा कर देना, परनिन्दा, आत्मप्रशंसा, संक्लेशप्रादर्भावन, जीवन को यों ही बरबाद करना, निर्दयता, हिंसा, महाआरम्भ, महापरिग्रह, विश्वासघात, कुटिलता, पापकर्मजीवित्व, अनर्थदण्ड, विषमिश्रण, बाण जाल पाश रस्सी पिंजरा यन्त्र आदि हिंसा के साधनों का उत्पादन, जबरदस्ती शस्त्र देना और दुःखादि पापमिश्रित भाव आदि भी गृहीत हो जाते हैं । ये आत्मा पर और उभय में रहनेवाले आसातावेदनीय के आस्रव के कारण होते हैं ।

16-21. प्रश्न – यदि दुःख के कारणों से असातावेदनीय का आस्रव होता है तो नग्न रहना केशलुंचन और अनशन आदि तपों का उपदेश भी दुःख के कारणों का उपदेश हुआ, अतः तीर्थंकरों को उसका उपदेश नहीं करना चाहिए ?

उत्तर –
यह प्रश्न ही नहीं हो सकता; यतः जैन तो प्रश्न कर नहीं सकते क्योंकि स्वतीर्थंकरों के उपदेश का व्याघात हो जाता है । बौद्धों के मत में जब सभी पदार्थ दुःख शून्य और अनात्मक रूप हैं तब हिंसादि की तरह दानादि में भी दुःखहेतुता ही रहेगी और इसलिए इनका उपदेश भी अकुशल का ही उपदेश कहा जायगा। इसी तरह अन्य मतवादियों को भी यम नियम परिपालन, विविध वेष, अनुष्ठान, दुश्चर उपवास, ब्रह्मचर्यवास आदि का दुःखहेतु होने से अनुष्ठान नहीं करना चाहिए और न उपदेश देना चाहिए; क्योंकि सभी वादी हिंसा आदि को दुःखहेतु होने से पापास्रव का कारण मानते ही हैं । सत्य बात तो यह है कि - क्रोधादि के आवेश के कारण द्वेषपूर्वक होनेवाले स्व, पर और उभय के दुःख आदि पापास्रव के हेतु होते है न कि स्वेच्छा से आत्मशुद्धयर्थ किये जानेवाले तप आदि । जैसे अनिष्टद्रव्य के सम्पर्क से द्वेषपूर्वक दुःख उत्पन्न होता है उस तरह बाह्य और अभ्यन्तर तप की प्रवृत्तिमें धर्मध्यानपरिणत मुनि के अनशन केशलुंचन आदि करने या कराने में द्वेष की सम्भावना नहीं है अतः असाता का बन्ध नहीं होता। जिस प्रकार यति अहिंसा आदि करने और कराने में प्रसन्न होता है उसी तरह उपवास आदि करने और कराने में उसे प्रसन्नता ही होती है। अतः अनशन आदि तप दुःखरूप नहीं हैं। जब मुनियों को किसी भी कारण से कभी भी क्रोधादि के उत्पन्न होने पर उसके परिमार्जन के लिए प्रायश्चित्त करना पड़ता है तब यति को अनशन आदि तपविधि में क्रोधादि परिणामों की सम्भावना ही नहीं की जा सकती, जिससे असाता का आस्रव माना जाय ।

जैसे वैद्य करुणाबुद्धि से रोगी के फोड़े की शल्य क्रिया करके भी क्रोधादि न होने से पापबन्ध नहीं करता उसी तरह अनादिकालीन सांसारिक जन्ममरण की वेदना को नाश करने की इच्छा से तप आदि उपायों में प्रवृत्ति करनेवाले यति के कार्यों में स्वपर-उभय में दुःखहेतुता दिखनेपर भी क्रोधादि न होने के कारण वह पाप का बन्धक नहीं होता । मनोरति को सुख कहते हैं। जैसे अत्यन्त दुःखी भी संसारी जीवों का जिन पदार्थों में मन रम जाता है वे ही सुखकारक होते हैं, उसी तरह यति का मन अनशन आदि करने में रमता है, प्रसन्न होता है अतः वह दुःखी नहीं है और इसीलिए असाता का बन्धक नहीं है । कहा भी है - "नगर हो या वन, स्वजन हो या परजन, महल हो या पेड़ की खोह, प्रिया की गोद हो या शिलातल, वस्तुतः मनोरति को ही सुख कहते हैं। जहाँ जिस का मन रम गया वह वहीं सुखी है।"