
सर्वार्थसिद्धि :
हिंसादिक दुःख ही हैं ऐसा चिन्तन करना चाहिए। शंका – हिंसादिक दुःख कैसे हैं ? समाधान – दुःख के कारण होने से। यथा-'अन्न ही प्राण हैं।' अन्न प्राणधारण का कारण है पर कारण में कार्य का उपचार करके जिस प्रकार अन्न को ही प्राण कहते हैं। या कारण का कारण होनेसे हिंसादिक दुःख हैं। यथा-'धन ही प्राण हैं।' यहाँ अन्नपान का कारण धन है और प्राण का कारण अन्नपान है, इसलिए जिस प्रकार धन को प्राण कहते हैं उसी प्रकार हिंसादिक असाता वेदनीय कर्म के कारण हैं और असाता वेदनीय दुःख का कारण है, इसलिए दुःख के कारण या दुःख के कारण के कारण हिंसादिक में दुःख का उपचार है। ये हिंसादिक दुःख ही हैं इस प्रकार अपनी और दूसरों की साक्षीपूर्वक भावना करनी चाहिए। शंका – ये हिंसादिक सबके सब केवल दुःख ही हैं यह बात नहीं है, क्योंकि विषयों के सेवन में सुख उपलब्ध होता है ? समाधान – विषयों के सेवन से जो सुखाभास होता है वह सुख नहीं है, किन्तु दाद को खुजलाने के समान केवल वेदना का प्रतिकारमात्र है। और भी अन्य भावना करने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं - |
राजवार्तिक :
1-4 जैसे प्राण के कारण अन्न को प्राण कह देते हैं उसी तरह दुःख के कारण हिंसादि में कार्यभूत दुःख का उपचार करके उन्हें दुःख कह देते हैं । अथवा, जैसे धन से अन्न आता है और अन्न से प्राणस्थिति होती है अतः कारण के कारण में कार्य का उपचार करके धन को प्राण कहते हैं उसी तरह हिंसादि असातावेदनीय के कारण हैं और असाता दुःख का कारण है, अतः हिंसादि को भी दुःख कहते हैं। कहा भी है - "धन मनुष्य का बाहिर घूमनेवाला प्राण है ।
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