
सुहुहँ लोहहँ जो विलउ, जो सुहु वि परिणामु
सो सुहु वि चारित्त मुणि, सो सासय-सुह-धामु ॥103॥
लोभ सूक्षम जब गले तब सूक्ष्म सुध-उपयोग हो
है सूक्ष्मसाम्पराय जिसमें सदा सुख का भोग हो ॥
अन्वयार्थ : [सुहुमहँ लोहहँ जो विलउ] सूक्ष्म लोभ के नष्ट हो जाने पर [जो सुहुमु वि परिणामु] जो सूक्ष्म परिणाम होता है [सो सुहुमु वि चारित्त मुणि] उसे सूक्ष्म चारित्र जानो [सो सासय-सुह-धामु] वह अविनाशी सुख का धाम है ।