+ परिहार-विशुद्धि चारित्र कथन -
मिच्छादिउ जो परिहरणु, सम्मद्दंसण-सुद्धि
सो परिहार-विसुद्धि मुणि, लहु पावहि सिव-सिद्धि ॥102॥
जो बढ़े दर्शनशुद्धि मिथ्यात्वादि के परिहार से
परिहारशुद्धी चरित जानो सिद्धि के उपहार से ॥
अन्वयार्थ : [मिच्छादिउ जो परिहरणु] मिथ्यात्वादिक के परिहार (त्याग) से जो [सम्मद्दंसण-सुद्धि] शुद्ध सम्यग्दर्शन होता है, [सो परिहार-विसुद्धि मुणि] उसे परिहारविशुद्धि चारित्र जानो [लहु पावहि सिव-सिद्धि] इससे जीव शीघ्र मोक्षसिद्धि को प्राप्त करता है ।