
एव हि लक्खण-लक्खियउ, जो परु णिक्कलु देउ
देहहँ मज्झहिँ सो वसइ, तासु ण विज्जइ भेउ ॥106॥
इन लक्षणों से विशद लक्षित देव जो निर्देह है
कोई भी अन्तर है नहीं जो देह-देवल में रहे ॥
अन्वयार्थ : [एव हि लक्खण-लक्खियउ] उपर्युक्त विविध नामों से लक्षित [जो परु णिक्कलु देउ] जो परम निष्कल देव है, [देहहँ मज्झहिँ सो वसइ] वह इस शरीर में ही रहता है [तासु ण विज्जइ भेउ] उसमें और इसमें कोई अन्तर नहीं है ।