+ ग्रंथकर्त्ता की अंतिम भावना -
संसारहँ भय-भीयएँ, जोगिचंद-मुणिएण
अप्पा-संबोहण कया, दोहा इक्क-मणेण ॥108॥
भवदुखों से भयभीत योगीचन्द्र मुनिवर देव ने
ये एकमन से रचे दोहे स्वयं को संबोधने ॥
अन्वयार्थ : [संसारहँ भय-भीयएँ] संसार से भयभीत (जीवों के लिए) [जोगिचंद-मुणिएण] योगीन्दु मुनि ने [अप्पा-संबोहण] आत्म-सम्बोधन के लिए [दोहा इक्क-मणेण] एकाग्र मन से इन दोहों की रचना [कया] की है ।