तत्र यदविनाभाव: प्रादुर्भावध्रवव्ययानां हि ।
यस्मादेकेन विना न स्यादितरद्वयं तु तन्नियमात्‌ ॥249॥
अपि च द्वाभ्यां ताभ्यामन्यतमाभ्यां बिना न चान्यतरत्‌ ।
एकं वा तदवश्यं तत्रयमिह वस्तुसंसिद्ध्यै ॥250॥
अथ तद्यथा विनाश: प्रादुर्भावं विना न भावीति ।
नियतमभावस्य पुनर्भावेन पुरस्सरत्वाच्च ॥251॥
उत्पादोपि न भावी व्ययं विना वा तथा प्रतीतत्वात् ।
प्रत्यग्रजन्मनः किल भावस्याभावतः कृतार्थत्वात्‌ ॥252॥
उत्पादध्वंसौ वा द्वावपि न स्तो विनापि तद्-धौव्यम् ।
भावस्याऽभावस्य च वस्तुत्वे सति तदाश्रयत्वाद्वा ॥253॥
अपि च ध्रौव्यं न स्यादुत्पादव्ययद्वयं विना नियमात्‌ ।
यदिह विशेषाभावे सामान्यस्य च सतोप्यभावत्वात् ॥254॥
एवं चोत्पादादित्रयस्य साधीयसी व्यवस्थेह ।
नैवान्यथाऽन्यनिह्नववदतः स्वस्यापि घातकत्वाच्च ॥255॥
अन्वयार्थ : ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य इन तीनों का परस्पर में अविनाभाव सम्बन्ध है । कारण कि एक के बिना बाकी के दो नहीं हो सकते हैं ।
इसी प्रकार इन तीनों में से किन्हीं दो के बिना कोई एक भी नहीं हो सकता है, इसलिए वस्तु की सिद्धि के लिये इन तीनों का एक साथ मानना आवश्यक है ।
खुलासा इस प्रकार है कि व्यय बिना उत्पाद के नहीं हो सकता है, क्‍योंकि अभाव नियम से भावपूर्वक ही होता है ।
इसी प्रकार उत्पाद भी बिना व्यय के नहीं हो सकता है क्योंकि एक तो ऐसा ही अनुभव में आता है और दूसरे उत्पाद रूप भाव व्ययरूप अभाव से ही कृतार्थ होता है ।
यदि कहा जाय कि उत्पाद और व्यय ध्रौव्य के बिना हो जायेंगे सो ऐसी बात भी नहीं है, क्योंकि वस्तु के सद्भाव में ही उसके आश्रय से भाव और अभाव घटित किये जा सकते हैं ।
इसी प्रकार उत्पाद और व्यय के बिना ध्रौव्य भी नियम से नहीं हो सकता है, क्योंकि विशेष के अभाव में सामान्य सत्‌ भी नहीं पाया जाता है ।
यहां उत्पाद आदिक तीन की व्यवस्था इस प्रकार साध लेना चाहिए अन्य प्रकार से नहीं, क्योंकि जो अन्य का निन्हव करता है वह अपना भी घातक हो जाता है ।