
उक्तं गुणपर्ययवद्द्रव्यं यत्तद् व्ययादियुक्तं सत् ।
अथ वस्तुस्थितिरिह किल वाच्याऽनेकान्तबोधशुद्ध्यर्थम् ॥261॥
स्यादस्ति च नास्तीति च नित्यमनित्यं त्वनेकमेकं च ।
तदतच्चेति चतुष्टययुग्मैरिव गुम्फितं वस्तु ॥262॥
अथ तद्यथा यदस्ति हि तदेव नास्तीति तच्चतुष्कं च ।
द्रव्येण क्षेत्रेण च कालेन तथाथ वाऽपि भावेन ॥263॥
अन्वयार्थ : जो गुण पर्याय वाला द्रव्य है वही व्ययादि से युक्त सत् है यह तो कहा । अब अनेकान्त ज्ञान की शुद्धि के लिये वस्तु के स्वरूप का विशेष विचार करते हैं -- कथंचित् है और कथंचित् नहीं है, कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है, कथंचित् अनेक है और कथंचित् एक है, कथंचित् वह है और कथंचित् वह नहीं है इस प्रकार इन चार युगलों के द्वारा ही मानों वस्तु गुम्फित हो रही है ।
खुलासा इस प्रकार है -- 'जो है वह नहीं भी है' इत्यादि वे चारों युगल द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा से घटित होते हैं ।