
एका हि महासत्ता सत्ता वा स्यादवान्तराख्या च ।
न पृथक्प्रदेशवत्वं स्वरूपभेदोऽपि नानयोरेव ॥264॥
किन्तु सदित्यभिधानं यत्स्यात्सर्वार्थसार्थसंस्पर्शि ।
सामान्यग्राहकत्वात् प्रोक्ता सन्मात्रतो महासत्ता ॥265॥
अपिऽचावान्तरसत्ता सद्द्रव्यं सनगुणश्च पर्याय: ।
सच्चोत्पादध्वंस: सदिति धौव्यं किलेति विस्तार: ॥266॥
अन्वयार्थ : सत्ता दो प्रकार की है -- एक महासत्ता है और दूसरी अवान्तर सत्ता । इस प्रकार से यद्यपि सत्ता के दो भेद हैं, तथापि न तो इनके पृथक्-पृथक् प्रदेश ही पाये जाते हैं और न इनमें स्वरूपभेद ही है ।
किन्तु सब पदार्थों में अन्वयरूप से जो 'सत्' इस प्रकार का कथन किया जाता है उसे सामान्य मात्र का ग्राहक होने से सत्सामान्य की अपेक्षा महासत्ता कहते हैं ।
तथा द्रव्य है, गुण है, पर्याय है, उत्पाद है, व्यय है, ध्रौव्य है इस प्रकार जितना भी विस्तार है वह अवान्तर सत्ता कहलाता है ।