
अयमर्थो वस्तु यदा सदिति महासत्तयावधार्येत ।
स्यात्तदवान्तरसत्तारूपेणाभाव एव न तु मूलात् ॥267॥
अपि चाऽवान्तरसत्तारूपेण यदावधार्यते वस्तु ।
अपरेण महासत्तारुपेणाभाव एव भवति तदा ॥268॥
दृष्टान्तः स्पष्टोऽयं यथा पटो द्रव्यमस्ति नास्तीति ।
पटशुक्लत्वादीनामन्यतमस्याविवक्षितत्वाच्च ॥269॥
अन्वयार्थ : आशय यह है कि जिस समय वस्तु 'सत्' इत्याकारक महासत्ता रूप से अवधारित की जाती है, उस समय उसका अवान्तर-सत्ता रूप से अभाव ही है । किन्तु यह अभाव मूल से नहीं कहा जा सकता है ।
इसी प्रकार जब अवान्तर-सत्ता रूप से वस्तु का निश्चय किया जाता है तब उसका महासत्तारूप से अभाव ही रहता है ।
उक्त कथन की सिद्धि के लिये यह उदाहरण ठीक है कि जैसे पट यह कथंचित् द्रव्य रूप भी है और कथंचित् द्रव्य रूप नहीं भी है ।
जब पटत्व की विवक्षा होती है तब वह द्रव्य ठहरता है और जब पटत्व की विवक्षा न हो कर शुक्लादि धर्मों की विवक्षा होती है तब वह द्रव्य नहीं भी ठहरता है । प्रकृत में भी इसी प्रकार समझना चाहिये ।