
कालो वर्तनमिति वा परिणमनं वस्तुन: स्वभावेन ।
सोऽपि पूर्ववद्द्वयमिह सामान्यविशेषरूपत्वात् ॥274॥
सामान्यं विधिरूपं प्रतिषेधात्मा भवति विशेषश्च ।
उभयोरन्यतरस्यावमग्नोन्मग्नत्वादस्ति नास्तीति ॥275॥
तत्र निरंशो विधिरिति स यथा स्वयं सदेवेति ।
तदिह विभज्य विभागै: प्रतिषेधश्चांशकल्पनं तस्य ॥276॥
तदुदाहरणं सम्प्रति परिणमनं सत्तयावधार्येत ।
अस्ति विवक्षितत्वादिह नास्त्यंशस्याऽविवक्षया तदिह ॥277॥
संदृष्टि: पटपरिणतिमात्रं कालायतस्वकालतया ।
अस्ति च तावन्मात्रान्नास्ति पटस्तन्तुशुक्लरूपतया ॥278॥
अन्वयार्थ : वर्तना का नाम काल है, अथवा प्रति-समय अपने स्वभावरूप से वस्तु का जो परिणमन होता है उसका नाम काल है । इसके भी पहले के समान सामान्य और विशेष ऐसे दो भेद है ।
विधिरूप सामान्य काल कहलाता है और निषेधरूप विशेष काल कहलाता है । इन दोनों में से किसी एक के विवक्षित और दूसरे के अविवक्षित होने के कारण अस्ति-नास्तिरूप विकल्प होता है ।
प्रकृत में अंश का न किया जाना ही विधि है । उदाहरणार्थ -- सब पदार्थ स्वभावतः सद्रूप हैं ऐसा मानना विधि है । तथा द्रव्य, गुण और पर्याय इत्यादि विविध भेदों के द्वारा उस सत् का विभाग करके उसमें अंश कल्पना का करना ही प्रतिषेध है ।
यहां सामान्य और विशेष काल के साथ अस्ति-नास्ति का उदाहरण यह है कि जिस समय केवल सद्रुप से परिणमन निश्चित किया जाता है उस समय उसकी विवक्षा होने से वह विधिरूप से है किन्तु उसके अंशों को विवक्षा नहीं होने से वह अंशों की अपेक्षा से नहीं है ।
उदाहराणार्थ -- पटरूप जो सामान्य परिणमन है वह काल सामान्य की अपेक्षा से पट का स्वकाल है, इसलिये इतनेमात्र की अपेक्षा से तो वह है किन्तु वही पट तन्तु और शुक्लरूप परिणमन विशेष की अपेक्षा से नहीं है ।