+ भाव की अपेक्षा अस्ति-नास्ति कथन -
भाव: परिणाम: किल स चैव तत्त्वस्वरूपनिष्पत्ति: ।
अथवा शक्तिसमूहो यदि वा सर्वस्वसारः स्यात्‌ ॥279॥
स विभक्तो द्विविध: स्यात्सामान्यात्मा विशेषरूपश्च ।
तत्र विवक्ष्यो मुख्य: स्यात्स्वभावोऽथ गुणोहि परभाव: ॥280॥
भाव का सामन्य और विशेष रूप-
सामान्यं विधिरेव हि शुद्ध: प्रतिषेधकश्च निरपेक्ष: ।
प्रतिषेधो हि विशेषः प्रतिषेध्य: सांशकश्च सापेक्ष: ॥281॥
अयमर्थो वस्तुतया सत्सामान्यं निरंशकं यावत्‌ ।
भक्तं तदिह विकल्पैर्द्रव्याद्यैरुच्यते विशेषश्च ॥282॥
तस्मादिदमनवद्यं सर्वं सामान्यतो यदाप्यस्ति ।
शेषविशेषविवक्षाभावादिह तदैव तन्नास्ति ॥283॥
यदि वा सर्वमिदं यद्विवक्षितत्वाद्विशेषतोऽस्ति यदा ।
अविवक्षितसामान्यात्तदैव तन्नास्ति नययोगात्‌ ॥284॥
अन्वयार्थ : भाव नाम परिणाम का है । तत्त्व का जो स्वरूप है वही उसका भाव है । अथवा शक्तियों का समुदाय भी भाव कहलाता है । अथवा भाव से पदार्थ के सर्वस्वसार का ग्रहण किया जाता है ।
विभाग करने पर उसके सामान्य और विशेष ऐसे दो भेद होते हैं । इनमें से जो विवक्षित होता है वह मुख्य हो जाता है अत: वह स्वभाव कहलाता है । तथा जो अविवक्षित होता है वह गौण हो जाता है, अतः वह परभाव कहलाता है ।
इन दोनों भेदों में से सामान्य भाव विधिरूप है जो शुद्ध, प्रतिषेधक और निरपेक्ष होता है । तथा विशेष भाव प्रतिषेधरूप है जो प्रतिषेध्य, सांश और सापेक्ष होता है ।
आशय यह है कि जब तक सत्‌ में अंश-कल्पना नहीं की जाती है तब तक वह सामान्य कहा जाता है और जब उसका द्रव्यादिरूप से विभाग कर दिया जाता है तब वह विशेष कहा जाता है ।
इसलिये ऐसा मानने में कोई आपत्ति नहीं कि जिस समय सत्‌ सामान्यरूप से है उस समय वह शेष विशेषों की विवक्षा नहीं होने से उसरूप से नहीं है ।
अथवा जिस समय ये सब पदार्थ विशेष रूप से विवक्षित होने के कारण उसरूप से हैं उस समय सामान्य की विवक्षा नहीं होने से वे उसरूप से नहीं हैं ।