+ क्या सत् और परिणाम दूध बिलोने वाली दो रस्सियों के समान हैं? -
अथ किं वैमुख्यतया विसन्धिरूपं द्वयं तदर्थकृते ।
वामेतरकरवर्त्तितरज्जू युग्मं यथास्वमिदमिति चेत्‌ ॥358॥
अन्वयार्थ : अथवा जिस प्रकार वाम और दक्षिण हाथ में रहनेवाछी दो रस्सियाँ परस्पर विमुखता से अलग-अलग रहकर भी यथायोग्य कार्य करती हैं, उसी प्रकार क्‍या सत्‌ और परिणाम भी परस्पर विमुखता से अनमिल रह कर ही अपने कार्य को करते हैं ?