
विन्ध्यहिमाचलयुग्मं दृष्टान्तो नेष्टसाधनायालम् ।
तदनेकत्वे नियमादिच्छानर्थक्यताऽविवक्षश्च ॥364॥
अन्वयार्थ : विन्ध्याचल और हिमाचल दोनों ही स्वतन्त्र सिद्ध हैं इसलिये एक में मुख्य / विवक्षा दूसरे में गौण / अविवक्षा हो नहीं सकती है । दूसरी बात यह है कि जब दोनों ही स्वतन्त्र सिद्ध हैं तो एक में मुख्य और दूसरे में गौण विवक्षा की इच्छा का होना ही निरर्थक है, इसलिये विन्ध्याचल और हिमाचल पर्वतों का हृष्टान्त भी इष्ट पदार्थ को सिद्ध करने के लिये समर्थ नहीं है ।