+ संस्कार-वश पदों में वाक्य प्रतीति मानना भी दोषपूर्ण -
संस्कारस्य वशादिह पदेषु वाक्यप्रतीतिरिति चेद्वै ।
वाच्यं प्रमाणमात्रं न नया ह्युक्तत्य दुर्निवारत्वात्‌ ॥362॥
अथ चैवं सति नियमाद्‌ दुर्वारं दूषणद्वयं भवति ।
नयपक्षच्युतिरिति वा क्रमवर्तित्वाद्ध्वनेरहेतुत्वम् ॥363॥
अन्वयार्थ : यदि संस्कार-वश पदों में वाक्य प्रतीति मानी जाय (नयों में ही प्रमाण की कल्पना कर ली जाय) तो यह मानना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा कथन करने पर नयों का अभाव होकर केवल प्रमाण के कथन करने की आपत्ति आती है जिसे रोकना दुर्निवार है ।
यदि कहा जाय कि केवल प्रमाणपक्ष मान लिया जाय तो ऐसा मानना भी ठीक नहीं है; क्योंकि ऐसा मानने पर दो ऐसे दूषण आते हैं जिनका रोकना दुर्वार हो जाता है । उक्त मान्यता के अनुसार एक तो नयपक्ष का सर्वथा अभाव प्राप्त होता है और दूसरे ध्वनि क्रमवर्ती होती है; यह जो हेतु दिया गया था वह समीचीन हेतु नहीं ठहरता ।