
अग्निर्वैश्वानर इव नामद्वैतं च नष्टसिद्ध्यर्थम् ।
साध्यविरुद्धत्वादिह संदृष्टेरथ च साध्यशून्यत्वात् ॥367॥
नामद्वयं किमर्थादुपेक्ष्य धर्मद्वयं च किमपेक्ष्य ।
प्रथमे धर्माभावेप्पलं विचारेण धर्मिणोऽभावात् ॥368॥
प्रथमेतरपक्षेऽपि च भिन्नमभिन्नं किमन्वयात्तदिति ।
भिन्नं चेदविशेषादुक्तवदसतो हि किं विचारतया ॥369॥
अथ चेद्युतसिद्धत्त्वात्तन्निष्पत्तिर्द्वयो: पृथक्त्वेपि ।
सर्वस्य सर्वयोगात् सर्व: सर्वोपि दुर्निवारः स्यात् ॥370॥
चेदन्वयादभिन्नं धर्मद्वैतं किलेति नयपक्षः ।
रूपपटादिवदिति किं किमथ क्षारद्रव्यवच्चेति ॥371॥
क्षारद्रव्यवदिदं चेदनुपादेयं मिथोनपेक्षत्वात् ।
वर्णततेरविशेषन्यायान्न नया: प्रमाणं वा ॥372॥
रूपपटादिवदिति चेत्सत्यं प्रकृतस्य सानुकूलत्वात् ।
एकं नामद्वयांकमिति पक्षस्य स्वयं विपक्षत्वात् ॥373॥
अन्वयार्थ : अग्नि और वैश्वानर के समान सत् और परिणाम ये दो नाम ही मानें जाँय तो भी इष्ट सिद्धि नहीं होती है । क्योंकि वे साध्य से विरुद्ध पड़ते हैं । दृष्टान्त भी साध्य शून्य है, अर्थात् हमारा साध्य-परस्पर सापेक्ष उभय धर्मात्मक पदार्थरूप है । उस उभय धर्मात्मक पदार्थरूप साध्य की सिद्धि दो नामों से नहीं होती है। तथा अग्नि और वैश्वानर ये दो नाम भिन्न रहकर एक अग्नि के वाचक हैं, इसलिये यह दृष्टान्त भी साध्य रहित है ।
यदि नाम द्वय का दृष्टान्त साध्य विरुद्ध नहीं है तो हम पूछते हैं कि नाम दो धर्मों की उपेक्षा रखते हैं अथवा अपेक्षा रखते हैं ? यदि पहला पक्ष स्वीकार किया जाय, अर्थात् दो नाम दो धर्मों की अपेक्षा नहीं रखते केवल एक पदार्थ के दो नाम हैं तो धर्मों का अभाव ही हुआ जाता है, धर्मों के अभाव में धर्मी भी नहीं ठहर सकता है, फिर तो विचार करना ही व्यर्थ है । यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् दो नाम दो धर्मों की उपेक्षा नहीं करते किन्तु अपेक्षा रखते हैं तो वे दोनों धर्मद्वय से भिन्न हैं अथवा अभिन्न हैं ? यदि द्रव्य से भिन्न हैं तो भी वे नहीं के समान हैं, फिर भी कुछ विशेषता नहीं हुई, जो धर्मद्वय से सर्वथा जुदे हैं तो वे उसके नहीं कहें जा सकते हैं, इसलिये उनका विचार करना ही निरर्थक है । यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्य से यद्यपि जुदे हैं, क्योंकि वे १युतसिद्ध हैं, तथापि उन धर्मों का द्रव्य के साथ सम्बन्ध मान लेने से कोई दोष नहीं आता है ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, यदि भिन्न पदार्थों का इसप्रकार सम्बन्ध मान लिया जाय तो सब पदार्थों का सब पदार्थों के साथ सम्बन्ध हो जायगा ऐसी अवस्था में सभी पदार्थ संकर हो जाँयगे अर्थात् जैसे सर्वथा भिन्न धर्मों का एक द्रव्य के साथ सम्बन्ध माना जाता है वैसे उनका हरएक द्रव्य के साथ सम्बन्ध हो सकता है, क्योंकि जब वे धर्मद्वय से सर्वथा जुदे ही हैं तो जैसे उनका एक द्रव्य से सम्बन्ध हो सकता है वैसे सब द्रव्यों से हो सकता है फिर सभी द्रव्य परस्पर मिल जाँयगे । द्रव्यों में परस्पर भेद ही न हो सकेगा । इसलिये द्रव्य से धर्मों को जुदा मानना ठीक नहीं है ।
यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्य से अभिन्न हैं तो प्रश्न होता है कि वे वस्त्र और वस्त्र में रहनेवाले रूप की तरह अभिन्न हैं अथवा आटे में मिले हुए खारेपन की तरह अभिन्न है ? यदि कहा जाय कि खारे द्रव्य के समान वे धर्मद्वय से अभिन्न हैं तो वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि लवण की रोटी में जो खारापन है वह लवण का है, रोटी का नहीं है । रोटी से खारापन जुदा ही है। इसी के समान घर्मद्वय भी द्रव्य से जुदे पड़ेंगे । जुदे होनेसे उनमें परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा भी २नहीं रहेगी । परन्तु सत् और परिणाम परस्पर सापेक्ष हैं इसलिये क्षार द्रव्य के समान उनकी अभिन्नता उपादेय नहीं है। क्षार द्रव्य के समान जो अभिन्नता है वह वैसी ही है जैसी कि क, ख, ग, घ आदि वर्णों की पंक्ति सर्वथा स्वतन्त्र होती है । इसप्रकार की स्वतन्त्रता मानने से न तो नय ही सिद्ध होते हैं और न प्रमाण ही सिद्ध होता है। बिना परस्पर की अपेक्षा के एक भी सिद्ध नहीं हो सकता है। इसलिये क्षार द्रव्य के समान न मानकर रूप और पट के समान उन धर्मों की अभिन्नता यदि मानी जाय तो यह प्रकृत के अनुकूल ही है । अर्थात् जिसप्रकार वस्त्र और उसका रंग अभिन्न है, बिना वस्त्र की अपेक्षा लिये उसके रंग की सिद्धि नहीं, और बिना उसके रंग की अपेक्षा लिये वस्त्र की सिद्धि नहीं, उसीप्रकार यदि परस्पर सापेक्ष सत् और परिणाम की अभिन्नता भी मानी जाय तब तो हमारा कथन ही सिद्ध होता है, फिर शंकाकार का एक पदार्थ के ही सत् और परिणाम, दो नाम कहना तथा अग्नि और वैश्वानर का दृष्टान्त देना निरर्थक ही नहीं किन्तु उसके पक्ष का स्वयं विघातक है । तात्पर्य यह है कि अग्नि और वैश्वानर ये दोनों अग्नि के ही पर्यायवाची हैं परन्तु सत् और परिणाम ये दोनों पर्यायवाची नहीं हैं किन्तु नय एवं विवक्षा भेद से हैं ।
१जो एक-दूसरे से आश्रित न होकर स्वतंत्र हों उन्हें युतसिद्ध कहते हैं । जैसे चौकी पर रक्खी हुई पुस्तक । युतसिद्ध दो भिन्न-भिन्न पदार्थों का सम्बन्ध है सत् परिणाम भिन्न-भिन्न नहीं हैं, एक द्रव्यात्मक हैं ।
२आटे और लवण में यद्यपि स्वाद की अपेक्षा से परस्पर अपेक्षा है, परन्तु ऐसी अपेक्षा नहीं है कि बिना आटे के लवण की सिद्धि न हो, अथवा बिना लवण के आटे की सिद्धि न हो । परन्तु सत् और परिणाम में वैसी ही अपेक्षा अभीष्ट है बिना सत् के परिणाम नहीं ठहरता और बिना परिणाम के सत् नहीं ठहरता । दोनों की एक दूसरे की अपेक्षा में ही सिद्धि है ।
३भिन्न-भिन्न रक्खे हुए सभी वर्ण स्वतन्त्र हैं, ऐसी अवस्था में उनसे किसी कार्य की भी सिद्धि नहीं हो सकती है ।