
अपि चाकिन्चित्कर इव सव्येतरगोविषाणदृष्टान्तः ।
सुरभि गगनारविन्दमिवाश्रयासिद्धदृष्टान्तात् ॥374॥
न यतः पृथगिति किन्चित् सत्परिणामातिरिक्तमिह वस्तु ।
दीपप्रकाशयोरिह गुम्फितमिव तद्-द्वयोरैक्यात् ॥375॥
अन्वयार्थ : [च] तथा [सुरभि गगनारविन्दमिव] आकाश के कमल की सुगंध की तरह [आश्रयासिद्धदृष्टान्तात्] आश्रयासिद्ध दृष्टांत होने से [सव्येतरगोविषाणदृष्टान्तः अपि] एक साथ उत्पन्न होने वाले गौ के वाम और दक्षिण सींगों का दृष्टांत भी [अकिन्चित्कर इव] अकिंचित्कर के सामान है ।
[यतः इह] क्योंकि यहाँ [सत्परिणामातिरिक्तम्] सत् तथा परिणाम से भिन्न आश्रयभूत [किन्चित् वस्तु] कोई वस्तु [पृथगिति न] पृथक नहीं है किन्तु
[तद्-द्वयोरैक्यात्] उन का एक होने से [इह] यहाँ पर [दीपप्रकाशयोरिह] दीप और प्रकाश की तरह [गुम्फितमिव] गुम्फित है ।