+ सपत्नीयुग्म दृष्टांत में अनेक दोष -
अपि च सपत्नीयुग्मं स्यादिति हास्यास्पदोपमा दृष्टिः ।
इह यदसिद्धविरुद्धानैकान्तिकदोषदुष्टत्वात् ॥379॥
माता मे वन्ध्या स्यादित्यादिवदपि विरुद्धवाक्यत्वात्‌ ।
क्रतकत्वादिति हेतोः क्षणिकैकान्तात्कृतं कृतं विचारतया ॥380॥
अन्वयार्थ : दो सपत्नियों (सौतों) का दृष्टान्त तो हास्य पैदा करता है, यह दृष्टान्त तो सभी दोषों से दूषित है, इस दृष्टान्त से असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक आदि सभी दोष आते हैं । जिसप्रकार किसी का यह कहना कि मेरी माता बाँझ है, सर्वथा विरुद्ध है, उसी प्रकार सत्‌ परिणाम को दो सपत्नियों के समान क्रम से उत्पन्न मानकर एक काल में परस्पर विरुद्ध रीति से उनकी सत्ता का कथन करना भी विरुद्ध है। क्योंकि सत्‌ परिणाम न तो किसी काल विशेष में क्रम से उत्पन्न ही होते हैं, और न वे एक स्थान में विरुद्ध रीति से ही रहते हैं, किन्तु अनादि अनन्त उनका परस्पर सापेक्ष प्रवाह युगपत्‌ चला जाता है । इसलिये सपत्नीयुग्म का दृष्टान्त विरुद्ध ही है ।
तथा जिसप्रकार कृतकत्व हेतु से घट शरावे के समान पदार्थों में भिन्नता सिद्ध करना अनैकान्तिक है क्योंकि पट और तन्तुओं में कृतक होने पर भी अभिन्नता पाई जाती है । इसलिये कृतकत्व हेतु अनैकांतिक हेत्वाभास दोष से दूषित है । इसीप्रकार सत्‌ परिणाम के विषय में दो सपत्नियों का दृष्टान्त भी अनैकान्तिक दोष से दूषित है। क्‍योंकि दो सपत्नियाँ कहीं पर परस्पर विरुद्ध होकर रहती हैं और कहीं पर परस्पर एक दूसरे की सहायता चाहती हुई प्रेमपूर्वक अविरुद्ध भी रहती हैं । यह नियम नहीं है कि दो सौतें परस्पर विरुद्ध रीति से ही रहें । इसलिये यह दृष्टान्त अनैकान्तिक दोष से दूषित है। अथवा सपत्नी युग्म में विरोधिता पाई जाती है कहीं नहीं भी पाई जाती है इसलिये अनैकान्तिक है तथा जिसप्रकार बौद्ध का यह सिद्धान्त कि सब पदार्थ अनित्य हैं क्योंकि वे सर्वथा क्षणिक हैं, सर्वथा असिद्ध है असिद्धता का हेतु भी यही है कि जो क्षणिककैकान्त हेतु दिया जाता है वह सिद्ध नहीं होता, क्योंकि पदार्थों में नित्यता भी प्रतीत होती है, यदि नित्यता पदार्थों में न हो तो यह वही पुरुष है जिसे दो वर्ष पहले देखा था, ऐसा प्रत्यभिज्ञान नहीं होना चाहिये परन्तु ऐसा यथार्थ प्रत्यभिज्ञान होता है, तथा यदि नित्यता पदार्थों में न मानी जाय तो स्मरण पूर्वक जो लोक में लेन-देन का व्यवहार होता है वह भी न हो सके, परन्तु वह भी यथार्थ होता है, इत्यादि अनेक हेतुओं से सर्वथा क्षणिकता पदार्थों में सिद्ध नहीं होती उसीप्रकार दो सपत्नियों का दृष्टान्त भी सर्वथा असिद्ध है क्योंकि दो सपत्नियाँ दो पदार्थ हैं । यहाँ पर सत्‌ परिणाम उभयात्मक एक ही पदार्थ है । दूसरे सपत्नीयुग्म विरोधी बनकर आगे-पीछे क्रम से होता है । सत्‌ परिणाम एक काल में अ्विरुद्ध रहते हैं । इसलिये यह दृष्टांत हास्यकारक है, इस पर अधिक विचार करना ही व्यर्थ है ।