+ कच्ची पक्की पृथ्वी भी दृष्टान्ताभास है -
आमानामविशिष्टं पृथिवीत्वं नेह भवति दृष्टान्तः ।
क्रमवर्त्तित्वादुभयोः स्वेतरपक्षद्वयस्य घातित्वात्‌ ॥376॥
परपक्षवधस्तावत्‌ क्रमवर्तित्वाच्च स्वतः प्रतिज्ञाया: ।
असमर्थसाधनत्वात्‌ स्वयमपि वा बाधकः स्वपक्षस्य ॥377॥
तत्साध्यमनित्यं वा यदि वा नित्यं निसर्गतो वस्तु ।
स्यादिह पृथिवीत्वतया नित्यमनित्यं ह्यपक्वपक्वतया ॥378॥
अन्वयार्थ : [आमानामविशिष्टं पृथिवीत्वं] कच्ची और पक्की अवस्था से विशिष्ट पृथ्वित्व [नेह भवति दृष्टान्तः] यहाँ पर दृष्टांत नहीं हो सकता क्योंकि [क्रमवर्त्तित्वादुभयोः] पृथ्वी की दोनों अवस्थाएं क्रम्वर्ती होती हैं इसलिए [स्वेतरपक्षद्वयस्य घातित्वात्‌] दृष्टांत स्व और पर दोनों पक्षों का घातक है ।
[परपक्षवधस्तावत्‌] परपक्ष (जैन-सिद्धांत) का वध तो इसप्रकार है कि शंकाकार ने [क्रमवर्तित्वाच्च स्वतः प्रतिज्ञाया:] प्रतिज्ञा को स्वयं क्रमवर्ती माना है तथा [असमर्थसाधनत्वात्‌] इस साध्य की सिद्धि के लिए हेतु को समर्थ न होने से [स्वयमपि वा बाधकः स्वपक्षस्य] स्व-पक्ष का भी (उक्त दृष्टांत) स्वयं बाधक है क्योंकि [तत्साध्यम्] (एकान्ति होने के कारण) शंकाकार का इष्ट मिट्टीरूप [निसर्गतो वस्तु] वस्तु स्वभाव से [नित्यं वा यदि वा नित्यं] नित्य ही अथवा अनित्य ही हो सकती है किन्तु [इह हि] यहाँ (जैन सिद्धांत में) निश्चय से वह [पृथिवीत्वतया] पृथ्वीत्वपने के द्वारा [नित्यमनित्यं ह्यपक्वपक्वतया] नित्य है और क्रमपूर्वक होनेवाले अपक्व और पक्वपाने के द्वारा अनित्य है ।