
इह यदपूर्णन्यायादस्ति परीक्षाक्षमो न दृष्टान्तः ।
अविशेषत्वापत्तौ द्वैताभावस्य दुर्निवारत्वात् ॥398॥
अपि चान्यतरेण विना यथेष्टसिद्धिस्तथा तदितरेण ।
भवतु विनापि च सिद्धि: स्यादेवं कारणाद्यभावश्च ॥399॥
अन्वयार्थ : यहाँ पर अपूर्ण न्याय से एक का मुख्यता से दूसरे का उदासीनता से ग्रहण करनेरूप दृष्टान्त भी परीक्षा करने योग्य नहीं है । क्योंकि अपूर्ण न्याय से जिसका मुख्यता से ग्रहण किया जायगा वही प्रधान ठहरेगा, दूसरा जो उदासीनता से कहा जायगा वह नहीं के बराबर सामान्य ठहरेगा; ऐसी अवस्था में द्वैत का अभाव दुनिवार ही होगा, अर्थात् जब दूसरा उदासीन नहीं के तुल्य है तो एक ही समभना चाहिये, इसलिये एक की ही सिद्धि होगी, परन्तु सत् परिणाम दो हैं । अत: अपूर्णा न्याय का दृष्टान्त उनके विषय में ठीक नहीं है ।
यदि यह कहा जाय कि दोनों ही यद्यपि समान हैं तथापि एक को मुख्यता से कह दिया जाता है तो यह कहना भी विरुद्ध ही पड़ता है, जब दोनों की समानता में भी एक के बिना दूसरे की सिद्धि हो जाती है तो दूसरे की भी सिद्धि पहले के बिना हो जायगी, अर्थात् दोनों ही निरपेक्ष अथवा एक व्यर्थ सिद्ध होगा, ऐसी अवस्था में कार्य-कारण भाव भी नहीं बन सकेगा । क्योंकि कार्य-कारण भाव तो एक दूसरे की आधीनता में ही बनता है । इसलिये अपूर्ण न्याय का हष्टांत सब तरह विरुद्ध ही पड़ता है ।