
मित्रद्वैतवदित्यपि दृष्टान्तः स्वप्नसन्निभो हि यतः ।
स्याद्गौरवप्रसंगाद्वेतोरपि हेतु हेतुरनवस्था ॥400॥
तदुदाहरणं कश्चित्स्वार्थं सृजतीति मूलहेतुतया ।
अपरः सहकारितया तमनु तदन्योपि दुर्निवारः स्यात् ॥401॥
कार्यम्प्रति नियतत्वाद्धेतुद्वैतं न ततोऽतिरिक्तंचेत् ।
तन्न यतस्तन्नियमग्राहकमिव न प्रमाणमिह ॥402॥
अन्वयार्थ : एक अपने कार्य को सिद्ध करता है, दूसरा उसका उसके कार्य में सहायक होता है, यह मित्रद्वय का दृष्टांत भी स्वप्न के समान ही है । जिसप्रकार स्वप्न में पाये हुए पदार्थ से कार्य-सिद्धि नहीं होती है, उसी प्रकार इस दृष्टांत से भी कुछ कार्य-सिद्धि नहीं होती है, क्योंकि इस दृष्टांत से हेतु का हेतु उसका भी फिर हेतु, उस हेतु का भी हेतु मानना पड़ेगा । ऐसा मानने से अनवस्था दोष आवेगा और गौरव का प्रसंग भी आवेगा । उसका दृष्टांत इसप्रकार है कि जैसे कोई पुरुष मुख्यता से अपने कार्य को सिद्ध करता है और दूसरा उसका मित्र उसके उस कार्य में सहायक हो जाता है । जिसप्रकार दूसरा पहले की सहायता करता है उसीप्रकार दूसरे की सहायता के लिये तीसरे सहायक की आवश्यकता है, उसके लिये चौथे की, उसके लिये पाँचवें की, इसप्रकार उत्तरोत्तर सहायकों की योजना अवश्य ही अनिवार्य होगी । यदि यह कहा जाय कि एक कार्य के लिये दो कारणों की ही आवश्यकता होती है उपादान कारण निमित्त कारण अथवा एक कार्य में दो ही सहायक मित्र आवश्यक होते हैं । उनसे अतिरिक्त कारणों की आवश्यकता ही नहीं होती तो यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि एक कार्य में दो ही कारण होते हैं उनसे अधिक होते ही नहीं, इस नियम का विधायक कोई प्रमाण नहीं है इसलिये सत् परिणाम के विषय में मित्र-द्वय का दृष्टान्त भी कुछ कार्यकारी नहीं है ।