सिद्धं विशेषवद्वस्तु सत्सामान्यं स्वतो यथा ।
नासिद्धो धातुसंज्ञोपि कश्चित् पीतः सितोऽपर: ॥1॥
अन्वयार्थ : जिसप्रकार वस्तु का सामान्य-धर्म स्वयं सिद्ध है उसीप्रकार वस्तु का विशेष-धर्म भी स्वतः सिद्ध है । जिसमें सामान्य-धर्म पाया जाता है उसी में विशेष-धर्म भी पाया जाता है यह बात असिद्ध नहीं है । जिसप्रकार किसी वस्तु की 'धातु' संज्ञा रख दी जाती है यह तो सामान्य है, चाँदी भी धातु कहलाती है, सोना भी धातु कहलाता है इसलिये धातु शब्द तो सामान्य है परन्तु कोई धातु पीली है और कोई सफेद है । यह पीले और सफेद का जो कथन है वह विशेष की अपेक्षा से है ।