
सोप्यलोको न शून्योस्ति षड्भिर्द्रव्यैरशेषतः ।
व्योममात्रावशेषत्वाद्-व्योमात्मा केवलं भवेत् ॥23॥
अन्वयार्थ : जो अलोक है वह भी छह द्रव्यों से सर्वथा शून्य नहीं है । अलोक में भी छह द्रव्यों में से एक आकाश द्रव्य रहता है इसलिये अलोक केवल आकाश स्वरूप ही है ।