
नासिद्धश्चोपचारोयं मूर्तं यत्तत्त्वतोपि च ।
वैचित्र्याद्वस्तुशक्तीनां स्वतः स्वस्यापराधतः ॥60॥
अन्वयार्थ : [अपि च] तथा [मूर्तं] मति और श्रुतज्ञान मूर्तिक है [अय च उपचारः] यह उपचार [असिद्ध: न] असिद्ध नहीं है [यतः] क्योंकि [तत्वतः] वास्तव में [वस्तुशक्तीनां वैचित्र्यात्] वस्तुओं के गुणों में विलक्षणता होती है इसलिये यह स्वभाव उन वस्तुओं का [स्वतः स्वस्यापराधतः] स्वयंसिद्ध अपराध है ।