
अपि चोपचारतो मूर्तं तूक्तं ज्ञानद्वयं हि यत् ।
न तत्तत्त्वाद्यथा ज्ञानं वस्तुसीम्नोऽनतिक्रमात् ॥59॥
अन्वयार्थ : [अपि च] और [यत् ज्ञानद्वयं] जो उन दोनों ज्ञानों को [मूर्त उक्तं] मूर्तिक कहा है [तत् तु उपचारतः] वह तो केवल उपचार से कहा है [तत्वात्] वास्तव में [तत् ज्ञानं तथा न] वे दोनों ज्ञान मूर्तिक नहीं है [हि] क्योंकि [वस्तुसीम्न; अनतिक्रमात्] कोई भी पदार्थ पर के सम्बन्ध से अपने स्वभाव का उल्लंघन नहीं करता है ।