
तत्र बन्धे न हेतुःस्याच्छक्ति वैभाविकी परम् ।
नोपयोगोपि तत्किन्तु परायत्तं प्रयोजकम् ॥73॥
अस्ति वैभाविकी शक्तिस्तत्तद्-द्रव्योपजीविनी ।
सा चेन्द्वन्धस्य हेतुःस्यादर्थान्मुक्तेरसंभव: ॥74॥
उपयोग: स्यादभिव्यक्ति: शक्तेः स्वार्थाधिकारणी ।
सैव बन्ध्य हेतुश्चेत्सर्वो बन्धः समस्यताम् ॥75॥
अन्वयार्थ : [तत्र बन्धे परं] उस बन्ध में केवल [वैभाविकी शक्तिः] वैभाविकी शक्ति [हेतुः न स्यात्] कारण नहीं है और [न उपयोग: अपि] न केवल उसका उपयोग भी कारण है [किंतु तत्] किंतु वह [परायत्त] परस्पर में एक-दूसरे के आधीन होकर रहना [प्रयोजक] कार्यकारी है ।
[या वैभाविकी शक्ति] यदि वैभाविकी शक्ति [तद्-द्रव्योपजीविनी अस्ति] जो उन में सदैव रहनेवाली है [सा चेत्] वह यदि [बन्धस्य हेतु:] बंध का कारण मानी जायगी तो [अर्थात्] वास्तव में [मुक्तेरसंभव:] मुक्ति नहीं हो सकेगी ।
[शक्ते:] शक्ति की [स्वार्थाधिकारणी] अपने विषय में अधिकार रखनेवाली [अभिव्यक्ति:] व्यक्तता [उपयोग स्यात्] उपयोग है और [चत्] यदि [सा एव] वह शक्ति की अभिव्यक्ति ही बन्ध का कारण मानी जाएगी तो [सर्व: बन्ध: समस्यतां] सभी प्रकार का बन्ध उसका उसी में समझा जाएगा ।