
अर्थाद्वैभाविकी शक्तिर्या सा चेदुपयोगिनी ।
तद्गुणाकारसंक्रातिर्बन्ध: स्यादन्यहेतुकः ॥72॥
अन्वयार्थ : [अर्थात्] वास्तव में [या] जो [वैभाविकी शक्ति] वैभाविकी शक्ति है [सा] वह [उपयोगिनी चेत्] यदि उपयोगवाली-चरिता्र्थ हो तो [अन्यहेतुक तद्गुणाकारसंक्राति] जो पर-द्रव्य के निमित्त से जीव और पुद्गल के गुणों में संक्रमण होना है [बन्ध: स्यात्] वह बन्ध कहलाता है ।