नैवं यतोस्ति परिणाम शक्तिजातं सतोऽखिलम् ।
कथं वैभाविकी शक्तिर्न स्याद्वै पारिणामिकी ॥88॥
अन्वयार्थ : [एवं न] ऐसा (पर निमित्त के बिना वैभाविकी शक्ति को शुद्ध अवस्था में अपीणमनशील मानना) नहीं है [यतः] क्योंकि जब [स्तः अखिलं शक्ति जातं] पदार्थ की सर्व शक्तियां [परिणामि अस्ति] सदैव परिणमनशील होती है तो फिर [वैभाविकी शाक्ति] वैभाविकी शाक्ति [वै] निश्चय से [पारिणामिकी कथं न स्यात्‌] शुद्ध अवस्था में परिणमनशील क्यों नहीं होगी ।