+ शंका -- स्वाभाविक तथा वैभाविक दोनों ही शक्तियां स्वतन्त्र रूप से मा तो क्‍या हानि है ? -
ननु चैवं चैका शक्तिस्तद्भावो द्विविधो भवेत् ।
एक: स्वाभाविकी भावो भावो वैभाविकोपर: ॥83॥
चेदवश्यं हि द्वे शक्ती सतः स्तः का क्षतिः सताम् ।
स्वाभाविकि स्वभावे: स्वै: स्वैर्विभावैर्विभावजा ॥84॥
सद्भावेथाप्यसद्भावे कर्मणां पुद्गलात्मनाम् ।
अस्तु स्वाभाविकी शक्ति: शुद्धैर्भावैर्विराजिता ॥85॥
अस्तु वैभाविकी शक्तिः संयोगात्पारिणामिकी ।
कर्मणामुदयाभावे न स्यात्सा पारिणामिकी ॥86॥
दण्डयोगाद्यथा चक्रं बम्भ्रमत्यात्मनात्मनि ।
दण्डयोगाद्विना चक्रं चित्रं वा व्यवतिष्ठते ॥87॥
अन्वयार्थ : [ननु] शंकाकार का कहना है कि [एवं च] उपर्युक्त इस कथन से तो यह सिद्ध होता है कि [शक्ति एका च] शक्ति एक है और [तद्भावः द्विविध] उसका परिणमन दो तरह का होता है । [एक: स्वामभाविकः भाव:] एक स्वाभाविक भाव तथा [अपर] दूसरा [वैभाविकः भाव:] वैभाविक भाव इसलिये [चेत्] यदि [सतः] द्रव्य की [द्वे शक्ति] स्वाभावि की और वैभाविकी दोनों ही शक्तियां [अवश्य] स्वतन्त्र रूप से [स्त] मानी जावें तो [सतां] द्रव्यों की [का क्षति:] क्‍या हानि है क्‍योंकि [हि] निश्चय से द्रव्य में [स्वै भावे: स्वाभाविकी] अपने-अपने स्वभावों से स्वाभाविकी शक्ति तथा [स्वै विभावै विभावजा] अपने-अपने विभावों से वैभाविकी शक्ति बनी रहेगी कारण कि [पुद्गलात्मनां कर्मणां] पुद्गलरूप कर्मों के [सद्भावे] सद्भाव में [अथ] अथवा [असद्भावे अपि] असद्भाव में भी [शुद्धै: भावे: विराजिता] अपने शुद्ध परिणमन से युक्त [स्वाभाविकी शक्ति: अस्तु] स्वाभाविकी शक्ति सदैव रहो तथा [वैभाविकी शक्ति:] वैभाविकी शक्ति [संयोगात्] पर-संयोग से तो [पारिणामिकी अस्तु] पारिणामिकी हो और [कर्मणां उदयाभावे] कर्मों का उदय नहीं रहने पर [सा] वही (वैभाविकी शक्ति) [पारिणामिकी न स्यात्‌] पारिणामिकी-परिणमनशील नही होगी [यथा] जैसे कि [चक्रं] कुम्हार का चक्र [दण्डयोगात्] दण्ड के सम्बन्ध से [आत्मना आत्मनि बम्भ्रमति] अपने द्वारा अपने में बार-बार घूमता है तथा [दण्डयोगात्‌ विना] दण्ड का योग न मिलने से [चक्रं] वही चक्र [चित्र वा] चित्र की तरह [व्यवतिष्ठते] स्थिर रहता है ।