
ननुपलब्धिशब्देन ज्ञानं प्रत्यक्षमर्थतः ।
तत् किं ज्ञानावृतेः स्वीयकर्मणोऽन्यत्र तत्क्षतिः ॥200॥
अन्वयार्थ : [ननु] शंकाकार का कहना है कि [अर्थत:] वास्तव में [उपलब्धिशब्देन] ज्ञान-चेतना के लक्षणभूत आत्मोपलब्धि में उपलब्धि शब्द से [प्रत्यक्ष ज्ञान] 'प्रत्यक्ष ज्ञान' यह अर्थ निकलता है इसलिए ज्ञानावरण कर्म को आत्मोपलब्धि का घातक मानना चाहिये । मिथ्यात्वोदय को नहीं मानना चाहिये किंतु ऊपर के पद्य में जब मिथ्यात्व के उदय को उस आत्मोपलब्धि का बाधक माना है [तत् किं] तो क्या [ज्ञानावृतेः स्वीयकर्मणोऽन्यत्र]) ज्ञान-घातक ज्ञानावरणी कर्म के सिवाय कोई दूसरे कर्म द्वारा भी [तत्क्षति:] उस आत्मोपलब्धि का घात होता है ।