
अर्थाज्ज्ञानं गुणः सम्यक् प्राप्तावस्थान्तरं यदा ।
आत्मोपलब्धिरुपं स्यादुच्यते ज्ञानचेतना ॥197॥
सा ज्ञानचेतना नूनमस्ति सम्यग्दृगात्मनः ।
न स्यान्मिथ्यादृशः क्वापि तदात्वे तदसम्भवात् ॥198॥
अस्ति चैकादशाङ्गानां ज्ञानं मिथ्यादृशोऽपि यत् ।
नात्मोपलब्धिरस्यास्ति मिथ्याकर्मोदयात्परम् ॥199॥
अन्वयार्थ : [अर्थात्] उक्त कथन का खुलासा इस प्रकार है कि [यदा] जिस समय [ज्ञानं गुण:] ज्ञान गुण [सम्यक् प्राप्तावस्थान्तरं] सम्यक्त्वयुक्त प्राप्त किया है अवस्थान्तर जिसने ऐसा [आत्मोपलब्धिरुपं स्यात्] आत्म-स्वरूप की उपलब्धिरूप होता है [तदा] उस समय [स्यादुच्यते ज्ञानचेतना] उसे ज्ञानचेतना कहते हैं ।
[सा ज्ञानचेतना] वह ज्ञान-चेतना [नूनमस्ति सम्यग्दृगात्मनः] निश्चय से सम्यग्दृष्टि जीव के ही होती है [स्यान्मिथ्यादृशः क्वापि] मिथ्यादृष्टि जे किसी भी अवस्था में [न तदात्वे तदसम्भवात्] उस का होना असंभव है ।
[मिथ्यादृशोऽपि] मिथ्यादृष्टि के भी [यत्] क्योंकि [अस्ति चैकादशाङ्गानां ज्ञानं] ग्यारह अंगों तक का ज्ञान होने पर भी [मिथ्याकर्मोदयात्परम्] मिथ्यात्व कर्म के उदय होने के कारण [नात्मोपलब्धिरस्यास्ति] आत्मोपलब्धि नहीं होती ।