
नोपलब्धिरसिद्धास्य स्वादुसंवेदनात् स्व्यम् ।
अन्यादेशस्य संस्कारमन्तरेण सुदर्शनात् ॥209॥
नातिव्याप्तिरभिज्ञाने ज्ञाने वा सर्ववेदिनः ।
तयोः संवेदनाभावात् केवलं ज्ञानमात्रतः ॥210॥
व्याप्यव्यापकभावः स्यादात्मनि नातदात्मनि ।
व्याप्यव्यापकताभावः स्वतः सर्वत्र वस्तुषु ॥211॥
उपलब्धिरशुद्धासौ परिणामक्रियामयी ।
अर्थादौदयिकी नित्यं तस्माद्वन्धफला स्मृता ॥212॥
अस्त्यशुद्धोपलब्धिः सा ज्ञानाभासाच्चिदन्वयात् ।
न ज्ञानचेतना किन्तु कर्म तत्फलचेतना ॥213॥
इयं संसारिजीवानां सर्वेषामविशेषतः ।
अस्ति साधारणी वृत्तिर्न स्यात् सम्यक्त्वकारणम् ॥214॥
न स्यादात्मोपलब्धिर्वा सम्यग्दर्शनलक्षणम् ।
शुद्धा चेदस्ति सम्यक्त्वं न चेच्छुद्धा न सा सुदृक् ॥215॥
अन्वयार्थ : यह जग स्वयं सुख-दुःख के स्वाद का संवेदन करता है इसलिये इसके उनकी उपलब्धि होती है यह बात असिद्ध नहीं है, क्योंकि संस्कार के बिना ही इसके अन्यादेश देखा जाता है ॥२०९॥
यदि ऐसा कहा जाय कि उपलब्धि का यह लक्षण प्रत्यभिज्ञान में या सर्वज्ञ के ज्ञान में भी घटित होता है, इसलिये अतिव्याप्ति दोष आता है सो यह बात भी नहीं है क्योंकि ये दोनों ज्ञान संवेदनरूप न होकर सिर्फ ज्ञानमात्र हैं, अतः इनमें उपलब्धि का लक्षण घटित नहीं होता ॥२१०॥
व्याप्य-व्यापक भाव जिस पदार्थ का उसी में होता है उससे भिन्न दूसरे में नहीं होता, क्योंकि यह व्याप्य-व्यापकपना सर्वत्र पदार्थों में स्वभावत: इसी प्रकार घटित होता है ॥२११॥
यह अशुद्ध उपलब्धि परिणाम क्रिया-स्वरूप होती है । यह वास्तत्र में कर्मों के उदय से होती है इसलिये निरन्तर बन्ध फलवाली मानी गई है ॥२१२॥
इसमें यद्यपि चेतन्य का अन्वय पाया जाता है तो भी मिथ्या-ज्ञानरूप होने के कारण अशुद्धोपलब्धि कहलाती है, इसलिये इसे ज्ञानचेतना नहीं कह सकते । किन्तु वह कर्म-चेतना और कर्मफल-चेतनारूप होती है ॥२१३॥
यह अशुद्धोपलब्धि सामान्यतया सब संसारी जीवों के समानरूप से पाई जाती है । यह सम्यक्त्व का कारण नहीं है ॥२१४॥
तात्पर्य यह है कि आत्मोपलब्धि मात्र सम्यग्दर्शन का चिन्ह नहीं है । किन्तु यदि वह शुद्ध हो तो हो वह सम्यग्दर्शन का लक्षण है
और यदि वह शुद्ध न हो तो सम्यग्दर्शन का लक्षण नहीं है ॥२१५॥