ननु चेयमशुद्धैव स्यादशुद्धा कथंचन ।
अथ बन्धफला नित्यं किमबन्‍धफला क्वचित्‌ ॥216॥
अन्वयार्थ : यह आत्मोपलब्धि क्या सर्वथा अशुद्ध होती है या कथंचित्‌ अशुद्ध होती है ? और क्या यह नित्य बन्धफलवाली है या किसी अवस्था-विशेष में बन्ध फलवाली नहीं भी है ?