
सातासातोदयाद्द:खमास्तां स्थूलोपलक्ष्यात् ।
सर्वकर्मोदयाघात इवाघाटश्चिदात्मन: ॥
आस्तां घातः प्रदेशेषु संदृष्टेरुपलब्धितः ।
वातव्याधेर्यथाध्यक्षं पीड्यन्ते ननु सन्धयः ॥249॥
न हि कर्मोदयः कश्चित् जन्तोर्य: स्यात् सुखावहः ।
सर्वस्य कर्मणस्तत्र वैलक्षण्यात् स्वरूपतः ॥250॥
तस्य मन्दोदयात् केचित् जीवाः समनस्काः कचित् ।
तद्वेगमसहमाना रमन्ते विषयेषु च ॥251॥
केचित्तीव्रोदयाः सन्तो मन्दाक्षा: खल्वसंज्ञिनः।
केवलं दुःखवेगार्ता रन्तुं नार्थानपि क्षमा: ॥252॥
अन्वयार्थ : साता और असाता के उदय से दुःख होता है यह कथन तो रहने दो, क्योंकि यह कथन स्थूल उपलक्षण मात्र है । वास्तव में सब कर्मों के उदय का आघात ही जीवात्मा के ऊपर वज्र की चोट के समान सबसे बड़ा आघात है ॥२४८॥
कर्मोदय के कारण जीव के सब प्रदेशों में घात हो रहा है क्योंकि इसके समर्थन में दृष्टान्त पाया जाता है । हम देखते हैं कि वातव्याधि के कारण शरीर की सब सन्धियां दुखती रहती हैं, इसलिये यह कथन तो रहने दो वास्तव में ऐसा कोई भी कर्मोदय नहीं है जो इस जीव को सुख प्राप्त करानेवाला हो । सब कर्मों का स्वरूप ही ऐसा विलक्षण है जिससे यह जीव सदा दुःखी ही रहता है ॥२४९-२५०॥
उस कर्म के मन्द उदय से कितने ही जीव संज्ञी होते हैं जो उसके वेग को न सहकर विषयों में रमण करने लगते हैं ॥२५१॥
तथा कितने ही जीव कर्म के तीव्र उदय के कारण निस्तेज इन्द्रिय वाले असंज्ञी होते हैं । ये केवल दुःख के वेग से पीड़ित रहते है इसलिये विषयों को भी नहीं भोग सकते हैं ॥२५२॥