नैवं यतः सुखं नैतत्‌ तत्सुखं यत्र नाऽसुखम्‌ ।
स धर्मो यत्र नाधर्मस्तच्छुभं यत्र नाऽशुभम्‌ ॥244॥
इदमस्ति पराधीनं सु्खं बाधापुरस्सरम्‌ ।
व्युच्छिन्नं बन्धहेतुश्च विषमं दुःखमर्थतः ॥245॥
उक्तं च--
सपरं बाधासहियं विच्छिण्णं बंधकारणं विषमं ।
जं इंदिएहि लद्धं तं सुक्खं दु:खमेव तहा ॥
भावार्थश्चात्र सर्वेषां कर्मणामुदयः क्षणात्‌ ।
वज्राघात इवात्मानं दुर्वारो निष्पिनष्टि वै ॥246॥
व्याकुलः सर्वेदेशेषु जीवः कर्मोदयाद्‌ध्रुवम्‌ ।
वन्हियोगाद्यथा वारि तप्तं स्पर्शोवलब्धितः ॥247॥
अन्वयार्थ : ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्‍योंकि यह ऐहिक सुख वास्तविक सुख नहीं है । सुख वह है जहां दुख नहीं है । धर्म वह है जहां अधर्म
नहीं है और शुभ वह है जहां अशुभ नहीं है ॥२४४॥
यह सुख पराधीन है, बाधाओं से घिरा हुआ है, सान्‍त है, बन्ध का कारण है और विषम है, इसलिये यह सुख वास्तव में दुःख ही है ॥२४५॥
कहा भी है --
जो सुख इन्द्रियों से प्राप्त होता है वह पराधीन है, बाधा सहित है, सान्‍त है, बन्ध का कारण है और विषम है । इसलिये वह दुःख ही है ।
पूर्वोक्त कथन का यह अभिप्राय है कि इस संसार में सब कर्मों का उदय प्रतिक्षण दुर्वार वज्राधात की तरह आत्मा को पीस रहा है ॥२४६॥
जिस प्रकार अग्नि के संसर्ग से जल गरम होता है क्योंकि ऐसे ही स्पर्श की उपलब्धि होती है उसी प्रकार यह जीव कर्मों के उदय से अपने सब प्रदेशों में नियम से व्याकुल हो रहा है ॥२४७॥