वैषयिकसुखे न स्याद्रागभावः सुदृष्टिनाम् ।
रागस्याज्ञानभावत्वादस्ति मिथ्यादृशः स्फुटम् ॥259॥
सम्यग्दृष्टेस्तु सम्यक्त्वं स्यादवस्थान्तरं चितः ।
सामान्यजनवत्तस्मान्नाभिलाषोऽस्य कर्मणि ॥260॥
उपेक्षा सवेभागेषु सद्-दृष्टेर्दृष्टरोगवत् ।
अवश्यं तदवस्थायास्तथाभावो निसर्गजः ॥261॥
अस्तु रूढिर्यथा ज्ञानी हेयं ज्ञात्वाऽथ मुञ्चति ।
अत्रास्त्यावस्थिकः कश्चित्परिणामः सहेतुकः ॥262॥
सिद्धमस्ताभिलाषत्वं कस्यचित्सर्वतश्चितः ।
देशतोऽप्यस्मदादीनां रागाभावस्य दर्शनात्‌ ॥263॥
तद्यथा न मदीयं स्यादन्यदीयमिदं ततः ।
परप्रकरणे कश्चित्तृप्यन्नपि न तृप्यति ॥264॥
यथा कश्चित्‌ परायत्तः कुर्वाणोऽनुचितां क्रियाम्‌ ।
कर्ता तस्याः क्रियायाश्च न स्यादस्ताभिलापवान् ॥265॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दृष्टियों के वैषयिक सुख में रागभाव नहीं होता है, क्योंकि राग अज्ञानभाव है । वह मिथ्यादृष्टि के नियम से होता है ॥२५९॥ सम्यग्दृष्टि के तो सम्यग्दर्शन होता है जो आत्मा की अत्यन्त भिन्न अवस्था है, अतः उसकी सामान्य मनुष्यों की तरह क्रिया मात्र में अभिलाषा नहीं होती ॥२६०॥
जिस प्रकार प्राणी मात्र के अनुभूत रोग में उपेक्षा भाव होता है उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि के सब प्रकार के भोगों में उपेक्षा भाव होता है । उसके अवस्था का ऐसा परिणमन स्वभाव से होता है ॥२६१॥
ज्ञानी पुरुष हेय पदार्थ को जानकर तदनन्तर उसका त्याग करता है, भले ही ऐसी रूढ़ि होओ, परन्तु सच तो यह है कि अवस्था विशेष से संबंध रखनेवाला कोई ऐसा स्वभाव ही इसमें कारण है जिससे उसकी हेय पदार्थ में स्वभावतः प्रवृत्ति हो नहीं होती ॥२६२॥
जब कि हम लोगों के एकदेश राग का अभाव देखा जाता है तो इससे किसी जीव के अभिलाषा का सर्वथा अभाव सिद्ध होता है ॥२६३॥
खुलासा इस प्रकार है कि जब किसी को ज्ञान हो जाता है कि 'यह मेरा नहीं है किन्तु अन्य का है और पर-वस्तु में तृप्त होकर भी कोई तृप्त नहीं होता है', वह उसकी अभिलाषा त्याग देता है ॥२६४॥
जिस प्रकार कोई पराधीन पुरुष अभिलाषा के बिना अनुचित क्रिया को करते हुए भी उस क्रिया का कर्ता नहीं होता है उसी प्रकार प्रकृत में जानना चाहिये ॥२६५॥