स्वदते ननु सद्दृष्टिरिन्द्रियार्थकदम्बकम् ।
तत्रेष्टं रोचते तस्मै कथमस्ताभिलापवान् ॥266॥
अन्वयार्थ :
जब सम्यग्दृष्टि जीव इन्द्रियों के विषयों का सेवन करता है और उनमें जो इष्ट होता है, वह उसे रुचता भी है तब फिर वह अभिलाषा रहित कैसे हो सकता है ?