+ श्रद्धान आदि गुण सम्यक्त्व के बाह्य लक्षण हैं और वह अनाकार है इसका विचार -- -
श्रद्धानादिगुणा बाह्यं लक्ष्म सम्यग्दृगात्मनः ।
न सम्यक्‍त्वं तदेवेति सन्ति ज्ञानस्य पर्ययाः ॥386॥
अपि स्वात्मानुभूतिस्तु ज्ञानं ज्ञानस्य पर्ययात्‌ ।
अर्थात्ज्ञानं न सम्यक्त्वमस्ति चेद् बाह्यलक्षणम्‌ ॥387॥
यथोल्लाघो हि दुर्लक्ष्यो लक्ष्यते स्थूललक्षणै: ।
वाङ्मनःकायचेष्टनामुत्साहादिगुणात्मकैः ॥388॥
नन्वात्मानुभवः साक्षात्‌ सम्यक्त्वं वस्तुतः स्वयम्‌ ।
सर्वत: सर्वकालेऽस्य मिथ्यादृष्टेरसम्भवात्‌ ॥389॥
नैवं यतोऽनिभिज्ञोऽसि सत्सामान्यविशेषयो: ।
अप्यनाकारसाकारलिङ्गयोस्तद्यथोच्यते ॥390॥
आकारोऽर्थविकल्पः स्यादर्थ: स्वपरगोचरः ।
सोपयोगो विकल्पो वा ज्ञानस्यैतद्धि लक्षणम्‌ ॥391॥
नाकारः स्यादनाकारो वस्तुतो निर्विकल्पता ।
शेषानन्तगुणानां तल्लक्षणं ज्ञानमन्तरा ॥392॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दृष्टि आत्मा के यद्यपि श्रद्धान आदि गुण होते हैं पर वे उसके बाह्य लक्षण हैं । सम्यक्‍त्व उनरूप नहीं है, क्‍योंकि वे ज्ञान की पर्याय है ॥३८६॥
तथा आत्मानुभूति भी ज्ञान ही है, क्योंकि वह ज्ञान की पर्याय है । वास्तव में वह आत्मानुभूति ज्ञान ही है सम्यक्‍त्व नहीं । यदि उसे सम्यक्त्व माना भी जाय तो वह उसका बाह्य लक्षण है ॥३८७॥
आशय यह है कि जिस प्रकार स्वास्थ्य-लाभ जन्य हर्ष का ज्ञान करना कठिन है परन्तु वचन, मन और शरीर की चेष्टाओं के उत्साह आदि गुणरूप स्थूल लक्षणों से उसका ज्ञान कर लिया जाता है उसी प्रकार अतिसूक्षम और निर्विकल्प सम्यग्दर्शन का ज्ञान करना कठिन है तो भी श्रद्धान आदि बाह्य लक्षणों के द्वारा उसका ज्ञान कर लिया जाता है ॥३८८॥
शंका--वास्तव में आत्मानुभव ही साक्षात्‌ सम्यक्त्व है, क्‍योंकि मिथ्यादृष्टि के इसका कभी भी पाया जाना असम्भव है ?
ऐसा नहीं है, क्योंकि सत्सामान्य और सद्विशेष का तथा अनाकार और साकार के चिन्हों का तुम्हें कुछ ज्ञान ही नहीं है । जो इस प्रकार है -- ज्ञान में अर्थ का विकल्प होना आकार कहलाता है और अर्थ स्व-पर के भेद से दो प्रकार का है । अथवा सोपयोग अवस्था का होना ही विकल्प है जो कि ज्ञान का लक्षण है ॥३८९-३९१॥
आकार का नहीं होना ही अनाकार है । उसी का नाम वास्तव में निर्विकल्पता है । यह निर्विकल्पता ज्ञान के सिवा शेष अनन्‍त गुणों का लक्षण है ॥३९२॥