नन्वस्ति वास्तवं सर्व सत्‌ सामान्यं विशेषवत्‌ ।
तत्‌ किं किंञ्चिदनाकारं किंञ्चित्साकारमेव तत्‌ ॥393॥
सत्यं सामान्यवज्ज्ञानमर्थाच्चास्ति विशेषवत्‌ ।
यत्सामान्यमनाकारं साकरं यद्विशेषभाक् ॥394॥
ज्ञानाद्विना गुणाः सर्वे प्रोक्ताः सल्लक्षणाङ्किताः ।
सामान्याद्वा विशेषाद्वा सत्यं नाकारमात्र काः ॥395॥
ततो वक्रुमशक्यत्वान्निर्विकल्पस्य वस्तुनः ।
तदुल्लेखं समालेख्य ज्ञानद्वारा निरूप्यते ॥396॥
स्वापूर्वार्थद्वयोरेव ग्राहकं ज्ञानमेकशः ।
नात्र ज्ञानमपूर्वार्थो ज्ञानं ज्ञानं परः परः ॥397॥
स्वार्थो वै ज्ञानमात्रस्य ज्ञानमेकं गुणश्चितः ।
परार्थ: स्वार्थसम्बन्धी गुणाः शेषे सुखादयः ॥398॥
अन्वयार्थ : जब कि सत्सामन्य और सद्विशेष यह सब वास्तविक है, तब फिर कुछ अनाकार है और कुछ साकार है ऐसा क्यों ?
यह कहना ठीक है तथापि ज्ञान वास्तव में सामान्य और विशेष दोनों प्रकार का होता है । उनमें से जो सामान्य ज्ञान है वह अनाकार होता है और जो विशेष ज्ञान है वह साकार होता है ॥३९३-३९४॥
तथा ज्ञान के सिवा सत्‌ लक्षणवाले सामान्य या विशेषरूप और जितने भी गुण कहे गये हैं वे सब वास्तव में अनाकार ही होते हैं ॥३९५॥
इसलिये निर्विकल्प वस्तु का कथन करना शक्य नहीं होने से जहां भी उसका उल्लेख किया जाता है वह ज्ञान द्वारा ही किया जाता है ॥३९६॥
यद्यपि स्व और अपूर्व दोनों प्रकार के पदार्थों को ज्ञान युगपत् ग्रहण करता है तथापि ज्ञान अपूर्वार्थ नहीं हो सकता है । किन्तु ज्ञान ज्ञान है और पर पर है ॥३९७॥
यतः चित्‌ शक्ति ज्ञानमात्र मानी गई है अतः केवलज्ञान ही उसका स्वार्थ है और स्वार्थ से सम्बन्ध रखनेवाले शेष सुखादि गुण उसके परार्थ हैं ॥३९८॥