
अनुकम्पा कृपा ज्ञेया सर्वसत्त्वेष्वनुग्रहः ।
मैत्रीभावोऽथ माध्यस्थं नै:शल्यं वैरवर्जनात् ॥446॥
दृङ्मोहानुदयस्तत्र हेतुर्वाच्योऽस्ति केवलम् ।
मिथ्याज्ञानं विना न स्याद्वैरभावः क्वचिद्यत: ॥447॥
मिथ्या यत्परतः स्वस्य स्वस्माद्वा परजन्मिनाम् ।
इच्छेत्तत्सुखदु:खादि मृत्युर्वा जीवितं मनाक् ॥448॥
अस्ति यस्यैतदज्ञानं मिथ्यादृष्टि: स शल्यवान् ।
अज्ञानाद्धन्तुकामोऽपि क्षमो हन्तुं न चापरम् ॥449॥
समता सर्वभूतेषु यानुकम्पा परत्र सा ।
अर्थतः स्वानुकम्पा स्याच्छल्यवच्छल्यवर्जनात् ॥450॥
रागाद्यशुद्धभावानां सद्भावे बन्ध एव हि ।
न बन्धस्तदसद्भावे तद्विधेया कृपात्मनि ॥451॥
अन्वयार्थ : अनुकम्पा का अर्थ कृपा है । या सब जीवों का अनुग्रह करना अनुकम्पा है । या मैत्रीभाव का नाम अनुकम्पा है । या मध्यस्थ भाव का रखना अनुकंपा है । या शत्रुता का त्याग कर देने से शल्य रहित हो जाना अनुकम्पा है ॥४४६॥
इसका कारण केवल दर्शन मोहनीय का अनुदय है, क्योंकि मिथ्या ज्ञान के बिना किसी जीव में बैर-भाव नहीं होता है ॥४४७॥
पर के निमित्त से अपने लिये या अपने निमित्त से अन्य प्राणियों के लिये थोड़े भी सुख, दुःखादि या मरण और जीवन की आशा करना मिथ्या ज्ञान है ॥४४८॥
और जिसके यह अज्ञान होता है वही मिथ्यादृष्टि है और वह शल्यवाला है । वह अज्ञानवश दूसरे को मारना चाहता है पर मार नहीं सकता ॥४४९॥
सब प्राणियों में जो समभाष धारण किया जाता है वह परानुकम्पा है ओर कांटे के समान शल्य का त्याग कर देना वास्तव में स्वानुकंपा है ॥४५०॥
रागादि अशुद्ध भावों के सद्भाव में बन्ध ही होता है और उनके अभाव में बन्ध नहीं होता, इसलिये अपने ऊपर ऐसी कृपा करनी चाहिये जिससे रागादि भाव न हों ॥४५१॥