+ संवेग गुण -
संवेगः परमोत्साहो धर्मे धर्मफले चितः ।
सधर्मेष्वनुरागो वा प्रीतिर्वा परमेष्ठिषु ॥431॥
धर्म: सम्यक्त्वमात्रात्मा शुद्धस्यानुभवोऽथवा ।
तत्फलं सुखमत्यक्षमक्षयं क्षायिकं च यत्‌ ॥432॥
इतरत्र पुना रागस्तद्गुणेष्वनुरागतः ।
नातद्गुणेऽनुरागोऽपि तत्फलस्याप्यलिप्सया ॥433॥
अत्रानुरागशब्देन नाभिलाषो निरुच्यते ।
किन्तु शेषमधर्माद्वा निवृत्तिस्तत्फलादपि ॥434॥
अथानुरागशब्दस्य विधिर्वाच्यो यदार्थतः ।
प्राप्ति: स्यादुपलब्धिर्वा शब्दाश्चैकार्थवाचकाः ॥435॥
न चाशंक्यं निषिद्धः स्यादभिलाषो भोगेष्वलम् ।
शुद्धोपलब्धिमात्रेऽपि हेयो भोगाभिलाषवत्‌ ॥436॥
अर्थात्सर्वोंऽभिलापः स्यादज्ञानं दृग्विपर्ययात्‌ ।
न्यायादलब्धतत्त्वार्थो लब्धुं कामो न लब्धिमान्‌ ॥437॥
मिथ्या सर्वोऽभिलापः स्यान्मिथ्याकर्मोदयात्परम्‌ ।
स्वार्थसार्थक्रियासिद्धौ नालं प्रत्यक्षतो यतः ॥438॥
क्वचित्तस्यापि सद्भावे नेष्टसिद्धिरहेतुतः ।
अभिलाषस्याभावेऽपि स्वेष्टसिद्धिश्च हेतुत:॥439॥
यशःश्रीसुतमित्रादि सर्वं कामयते जगत् ।
नास्य लाभोऽभिलापेऽपि विना पुण्योदयात्सतः ॥440॥
जरामृत्युदरिद्रादि न हि कामयते जगत्‌ ।
तत्संयोगो बलादस्ति सतस्तत्राशुभोदयात्‌ ॥441॥
संवेगो विधिरूपः स्यान्निर्वेदश्च निषेधनात्‌ ।
स्याद्विवक्षावशाद्‌ द्वैतं नार्थादर्थान्तरं तयोः ॥442॥
त्यागः सर्वाभिलाषस्य निर्वेदो लक्षणात्तथा ।
स संवेगोऽथवा घर्म: साभिलाषो न धर्मवान्‌ ॥443॥
नापि धर्म: क्रियामात्रं मिथ्यादृष्टेरिहार्थतः ।
नित्यं रागादिसद्भावात् प्रत्युताधम एव सः ॥444॥
नित्यं रागी कुदृष्टिः स्यान्न स्यात्‌ क्वचिदरागवान्‌ ।
अस्तरागोऽस्ति सद्दृष्टिर्नित्यं वा स्यान्न रागवान् ॥445॥
अन्वयार्थ : धर्म में और धर्म के फल में आत्मा का परम उत्साह होना या समान धर्मवालों में अनुराग का होना या परमेष्ठियों में प्रीति का होना संवेग हैं ॥४३१॥
सम्यक्त्व मात्र या शुद्ध आत्मा का अनुभव ही धर्म है और अतीन्द्रिय, अविनाशी क्षायिक सुख ही उसका फल है ॥४३२॥
समान धर्मवालों में और पाँच परमेष्ठियों में जो अनुराग हो वह उनके गुणों में अनुराग बुद्धि से ही होना चाहिये । किन्तु जो समान धर्मवालों या पाँच परमेष्ठियों के गुणों से रहित हैं, उनमें इन समान होने की लिप्सा के बिना भी अनुराग नहीं होना चाहिये ॥४३३॥
प्रकृत में अनुराग शब्द का अर्थ अभिलाषा नहीं कहा गया है किन्तु अधर्म और अधर्म के फल से निवृत्ति हो कर जो शेष रहता है वही अनुराग शब्द का अर्थ है ॥४३४॥
अथवा जिस समय अनुराग शब्द का अर्थ विधिरूप से कहा जाता है उस समय उसका अर्थ प्राप्ति और उपलब्धि होता है, क्योंकि अनुराग, प्राप्ति और उपलब्धि ये तीनों शब्द एकार्थवाचक हैं ॥४३५॥
ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये कि अभिलाषा केवल भोगों में ही निषिद्ध मानी गई है । किन्तु जैसे भोगों की अभिलाषा निषिद्ध है वेसे ही शुद्धोपलब्धि की अभिलाषा भी निषिद्ध मानी गई है ॥४३६॥
वास्तव में जितनी भी अभिलाषा है वह सब सम्यग्दर्शन के अभाव में होती है इसलिये वह अज्ञानरूप ही है, क्‍योंकि जिसे तत्त्वार्थ की प्राप्ति नहीं हुई है वही प्राप्त करना चाहता है । जिसने प्राप्त कर लिया है, वह नहीं ॥४३७॥
वास्तव में जितनी भी अभिलाषाएं हैं, वे सब केवल मिथ्या कर्म के उदय से होती हैं इसलिये मिथ्या ही हैं, क्योंकि यह हम प्रत्यक्ष से देखते हैं कि कोई भी अभिलाषा अपने अभीष्ट-क्रिया की सिद्धि कराने में समर्थ नहीं है ॥४३८॥
उदाहरणार्थ कहीं पर अभिलाषा के होने पर भी कारण सामग्री के नहीं मिलने से इष्ट-सिद्धि नहीं होती है और कहीं पर अभिलाषा के नहीं होने पर भी कारण सामग्री के मिल जाने से इष्ट-सिद्धि हो जाती है ॥४३९॥
यद्यपि सम्पूर्ण जगत्‌ यश, लक्ष्मी, पुत्र और मित्र आदि की चाह करता है तथापि पुण्योदय के बिना केवल चाह मात्र से उनकी प्राप्ति नहीं होती ॥४४०॥
इसी प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌ जरा, मृत्यु और दरिद्रता आदि की चाह नहीं करता है तथापि यदि जीव के अशुभ का उदय है तो चाह के बिना भी जबरदस्‍ती उनका संयोग हो जाता है ॥४४१॥
संवेग विधिरूप होता है और निर्वेद निषेधरूप होता है । विवक्षा-वश से ही ये दो हैं वास्तव में इन दोनों में कोई भेद नहीं है ॥४४२॥
सब प्रकार की अभिलाषाओं का त्याग ही निर्वेद है, क्योंकि इसका यही लक्षण है । अथवा वह निर्वेद संवेगरूप धर्म प्राप्त होता है, क्योंकि जो अभिलाषा सहित होता है उसके संवेगधर्म नहीं हो सकता ॥४४३॥
यदि क्रियामात्र को धर्म कहा जाय सो भी बात नहीं है, क्‍योंकि मिथ्यादृष्टि के निरन्तर रागादि पाये जाते हैं इसलिये वह वास्तव में अधर्म ही है ॥ ४४४॥
मिथ्यादृष्टि जीव निरन्तर रागी होता है वह रागरहित कभी भी नहीं हो सकता और सम्यग्दृष्टि जीव निरन्तर रागरहित होता है अथवा उसके सदाकाल राग नहीं पाया जाता ॥४४५॥