
अस्त्युपलाक्षम् यत्तल्लक्षणस्यापि लक्षणम् ।
तत्तथास्त्यादिलक्ष्यस्य लक्षणम् चोत्तरस्य तत् ॥468॥
यथा सम्यक्त्वभावस्य संवेगो लक्षणम् गुणः ।
स चोपलक्ष्यते भक्तया वात्सल्येनाथवार्हताम ॥469॥
अन्वयार्थ : जो लक्षण का भी लक्षण है वह उपलक्षण कहलाता है । क्योंकि जो आगे के लक्ष्य का लक्षण है वही प्रथम लक्ष्य का उपलक्षण है ॥४६८॥
सम्यक्त्व भाव का संवेग गुण लक्षण है, इसलिये सम्यक्त्व भाव अरहन्तों की भक्ति और वात्सल्य से उपलक्षित हो जाता है ॥४६९॥