
तत्र भक्तिरनौद्धत्यं वाग्वपुश्चेतसां शमात् ।
वात्सल्यं तद्गुणोत्कर्षहेतवे सोद्यतं मनः ॥470॥
भक्तिर्वा नाम वात्सल्यं न स्यात् संवेगमन्तरा ।
स संवेगो दृशो लक्ष्म द्वावेतावुपलक्षणम् ॥471॥
अन्वयार्थ : कर्मों का उपशम हो जाने से वचन, शरीर और चित्त का उद्धत न होना ही भक्ति है और सम्यक्त्व के गुणों का उत्कर्ष, करने के लिये मन का तत्पर रहना ही वात्सल्य है ॥४७०॥
भक्ति और वात्सल्य ये संवेग के बिना नहीं होते, इसलिये संवेग सम्यग्दर्शन का लक्षण है और ये दोनों उसके उपलक्षण हैं ॥४७१॥