
सम्यग्दर्शनमष्टाङगमस्ति सिद्धं जगत्रये ।
लक्षणं च गुणरचाङ्गं शब्दाश्चैकार्थवाचकाः ॥478॥
निःशङ्कितं यथा नाम निष्कांक्षितमतः परम् ।
विचिकित्सावर्जं चापि तथा दृष्टेरमूढता ॥479॥
उपबृंहणनामा च सुस्थितीकरणं तथा ।
वात्सल्यं च यथाम्नायाद् गुणोऽप्यस्ति प्रभावना ॥480॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दशन के आठ अंग हैं यह बात तीन-लोक में प्रसिद्ध है तथा लक्षण, गुण और अंग ये शब्द एकार्थ वाचक हैं ॥४७८॥
वे आठ अंग निम्न प्रकार हैं -- पहला निःशंकित अंग है । उसके बाद दूसरा नि:कांक्षित अंग है । तीसरा निर्विचिकित्सा अंग है । चौथा अमूढ्दृष्टि अंग है । पांचवां उपबृहण अंग है । छठा स्थितिकरण अंग है । सातवां वात्सल्य अंग है और आठवां आम्नाय के अनुसार प्रभावना अंग है ॥४७९-४८०॥