शंङ्का भीः साध्वसं भीतिर्भयमेकाभिधा अमी ।
तस्य निण्क्रान्तितो जातो भावो निःशङ्कितोऽर्थतः ॥481॥
अर्थवशादत्र सूत्रे शंका न स्यान्मनीषिणाम् ।
सूक्ष्मान्तरितदूरार्था: स्युस्तदास्तिक्यगोचराः ॥482॥
तत्र धर्मादयः सूक्ष्मा: सूक्ष्मा: कालाणवोऽणवः ।
अस्ति सूक्ष्मत्वमेतेषां लिङ्गस्याक्षैरदर्शनात्‌ ॥483॥
अन्तरिता यथा द्वीपसरिन्नाथनगाधिपाः ।
दूरार्था भाविनोऽतीता रामरावणचक्रिण: ॥484॥
न स्यान्मिथ्यादृशो ज्ञानमेतेषां क्वाप्पसंशयम्‌ ।
संशयस्यादिहेतोर्वे दृङ्मोहस्योदयात्‌ सतः ॥485॥
न चाशङ्कस्यं परोक्षास्ते सद्दृष्टेर्गोचराः कुतः ।
तै: सह सन्निकर्षस्य साक्षिकस्याप्यसम्भवात्‌ ॥486॥
अस्ति तत्रापि सम्यक्त्वमाहात्म्यं महतां महत्‌ ।
यदस्य जगतो ज्ञानमस्त्यास्तिक्यपुरस्सरम ॥487॥
नासम्भवमिदं यस्मात्‌ स्वभावोऽतर्कगोचरः ।
अतिवागतिशयः सर्वो योगिनां योगशक्तिवत्‌ ॥488॥
अस्ति चात्मपरिच्छेदि ज्ञानं सम्यग्दृगात्मनः ।
स्वसंवेदनप्रत्यक्षं शुद्धं सिद्धास्पदोपमम् ॥489॥
यत्रानुभूयमानेऽपि सर्वैराबालमात्मनि ।
मिथ्याकर्मविपाकाद्वै नानुभूति: शरीरिणाम्‌ ॥490॥
सम्यग्दृष्टे: कुदृष्टेश्च स्वादुभेदोऽस्ति वस्तुनि ।
न तत्र वास्तवो भेदो वस्तुसीम्नोऽनतिक्रमात्‌ ॥491॥
अत्र तात्पर्यमेवैतत् तत्वैकतत्त्वेऽपि यो भ्रमः ।
शङ्कायाः सोऽपराधोऽस्ति सा तु मिथ्योपजीविनी ॥492॥
अन्वयार्थ : शंका, भी, साध्वस, भीति और भय ये शब्द एकार्थवाचक हैं । इस भय के निकल जाने से जो भाव पैदा होता है वह वास्तव में निःशंकित अंग है ॥४८१॥
प्रकरण वश इसका यह भी अभिप्राय है कि इस गुण के कारण मनीषी पुरुषों को जिनागम में शंका नहीं होती है, क्‍योंकि सूक्ष्म, अन्तरित और दूरवर्ती पदार्थ उनके आस्तिक्य गुण के विषय रहते हैं (वे जिनागम के अनुसार इन पदार्थों का अस्तित्व स्वीकार करते हैं) इसलिये उन्हें इन पदार्थों का प्रतिपादन करनेवाले जिनागम में किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती ॥४८२॥
इन तीन प्रकार के पदार्थों में धर्मादिक द्रव्य कालाणु और पुद्गल परमाणु ये सूक्ष्म पदार्थ हैं, क्‍योंकि इन्द्रियों द्वारा इनके साधक साधन का ज्ञान नहीं होता इसलिये ये सूक्ष्म माने गये है ॥४८३॥
द्वीप, समुद्र और भूतकाल में हुए तथा भविष्यत्‌ काल में होने वाले राम, रावण और चक्रवर्ती दूरवर्ती पदार्थ हैं ॥४८४॥
मिथ्यादृष्टि जीव के इन पदार्थों का निःशंसय ज्ञान कभी भी नहीं होता, क्योंकि उसके संशय का मूल कारण दर्शनमोहनीय का उदय पाया जाता है ॥४८५॥
वे सूक्ष्म आदि पदार्थ परोक्ष हैं और उनके साथ इन्द्रिय सन्निकर्ष भी सम्भव नहीं है इसलिये वे सम्यग्दृष्टि के विषय कैसे हो सकते हैं यदि कोई ऐसी आशंका करे सो एसी आशंका करना भी ठीक नहीं है, क्‍योंकि इस विषय में भी सम्यग्दृष्टियों के सम्यक्त्व का बड़ा भारी माहात्म्य है जिससे उनके इस जग का आस्तिकता को लिये हुए ज्ञान होता है ॥४८६-४८७॥
और यह बात असंभव भी नहीं है, क्योंकि स्वभाव तर्क का विषय नहीं होता जैसे योगियों की योगशक्ति वचन अगोचर है वैसे यह सब अतिशय भी वचन अगोचर है ॥४८८॥
सम्यग्दृष्टि जीव के आत्मा को जाननेवाला स्वसंवेदन प्रत्यक्ष नाम का ज्ञान होता है जो सिद्धों के समान शुद्ध होता है ॥४८९॥
यद्यपि वृद्ध जनों से लेकर बालक तक सबको आत्मा का अनुभव होता है तथापि मिथ्यात्व कर्म के उदय से जीवों को इसकी अनुभूति नहीं होती ॥४९०॥
सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि को जो वस्तु का स्वाद आता है उसमें भेद है किन्तु वस्तु में वास्तविक भेद नहीं है क्‍योंकि वस्तु सीमा का उल्लंघन कभी नहीं होता ॥४९१॥
इसका यही तात्पर्य है कि दोनों के विषय-भूत पदार्थ के एक होने पर भी जो भ्रम होता है वह शंका का अपराध है और वह शंका मिथ्यात्व के उदय के साथ होनेवाली है ॥४९२॥