+ वेदना-भय -
वेदनाऽऽगन्तुका बाधा मलानां कोपतस्तनौ ।
भीतिः प्रागेव कम्पः स्यान्मोहाद्वा परिदेवनम्‌ ॥524॥
उल्लाघोऽहं भविष्यामि माभून्मे वेदना क्वचित् ।
मूर्च्छैव वेदनाभीतिश्चिन्तनं वा मुहुर्मुहुः ॥525॥
अस्ति नूनं कुदृष्टे सा दृष्टिदोषैकहेतुतः ।
नीरोगस्यात्मनोऽज्ञानान्न स्यात्सा ज्ञानिन: क्वचित्‌ ॥526॥
पुदलाद्भिन्नचिद्धाम्नो न मे व्याधिः कुतो भयम्‌ ।
व्याधिः सर्वा शरीरस्य नामूर्तस्येति चिन्तनम्‌ ॥527॥
यथा प्रज्वलितो वन्हि: कुटीरं दहति स्फुटम् ।
न दहति तदाकारमाकाशमिति दर्शनात्‌ ॥528॥
स्पर्शनादीन्द्रियार्थेषु प्रत्युत्पन्नेषु भाविषु ।
नादरो यस्य सोऽस्त्यथान्निभीको वेदनाभयात्‌ ॥529॥
अन्वयार्थ : शरीर में बातादि मलों के कुपित होने से जो बाधा उत्पन्न होती है वह वेदना कहलाती है । इस वेदना के पहले ही शरीर में कम्प होने लगता है । अथवा मोहवश यह जीव विलाप करने लगता है । इसी का नाम वेदना भय है ॥५२४॥
मैं नीरोग हो जाऊं, मुझे वेदना कभी भी न हो इस प्रकार की मूर्च्छा का होना या इस प्रकार बार-बार चिन्तवन करना ही वेदना भय है ॥५२५॥
वह वेदना भय मिथ्यादर्शन के कारण निरोग आत्मा का ज्ञान न होने से मिथ्यादृष्टि जीव के नियम से होता है । किन्तु ज्ञानी जीव के वह कभी भी नहीं पाया जाता ॥५२६॥
ज्ञानी जीव विचार करता है कि आत्मा चैतन्यमात्र का स्थान है जो पुद्गल से भिन्न हैं इसलिये जब कि मुझे व्याधि ही नहीं तब भय कैसे हो सकता है । जितनी भी व्याधियां हैं वे सब शरीर में ही होती हैं, अमूर्त आत्मा में नहीं ॥५२७॥
जैसे प्रदीप्र हुई अग्नि झोपड़ी को जलाती है किन्तु झोपड़ी के आकार रूप से स्थित हुए आकाश को नहीं जलाती यह प्रत्यक्ष दिखाई देता है वैसे ही व्याधि शरीर में होती है आत्मा में नहीं यह भी अनुभव-सिद्ध है ॥५२८॥
उसका स्पर्शन आदि इन्द्रियों के वर्तमान कालीन और भविष्यत्‌ कालीन विषयों में आदर नहीं है वही वास्तव में वेदना भय से निर्भीक है ॥५२९॥