
परलोकः परत्रात्मा भाविजन्मान्तरांशभाक् ।
तत: कम्प इव त्रासो भीति: परलोकतोऽस्ति सा ॥516॥
भद्रं चेज्जन्म स्वर्लोके माभून्मे जन्म दुर्गतौ ।
इत्याद्याकुलितं चेतः साध्वसं पारलौकिकम् ॥517॥
मिथ्यादृष्टेस्तदेवास्ति मिथ्याभावैककारणात् ।
तद्विपक्षस्य सद्-दृष्टेर्नास्ति तत्तत्र व्यत्ययात् ॥598॥
बहिर्दृष्टिरनात्मज्ञो मिथ्यामात्रैकभूमिक: ।
स्वं समासादयत्यज्ञ: कर्म कर्मफलात्मकम् ॥519॥
ततो नित्यं भयाक्रान्तो वर्तते भ्रान्तिमानिव ।
मनुते मृगतृष्णायाम्भोभारं जनः कुधीः ॥520॥
अन्तरात्मा तु निर्भीकः पदं निर्भयमाश्रितः ।
भीतिहेतोरिहावश्यं भ्रान्तेरत्राप्यसम्भवात् ॥521॥
मिथ्याभ्रान्तिर्यदन्यत्र दर्शनं चान्यवस्तुनः ।
यथा रज्जौ तमोहेतोः सर्पाध्यासाद् द्रवत्यधी: ॥522॥
स्वसंवेदनप्रत्यक्षं ज्योतिर्यो वेत्त्यनन्यसात् ।
स विभेति कुतो न्यायादन्यथाऽभवनादिह ॥523॥
अन्वयार्थ : आगामी जन्मान्तर को प्राप्त होने वाले परभव सम्बन्धी आत्मा का नाम ही पर लोक है । इस के कारण जीव को कम्प के समान दुःख होता है इसलिये ऐसे भय को परलोक भय कहते हैं ॥५१६॥
यदि इस लोक में जन्म हो तो अच्छा है, दुर्गंति में मेरा जन्म मत होवे इत्यादि रूप से चित्त का आकुलित होना ही परलोक भय है ॥५१७॥
मिथ्यादृष्टि जीव के ऐसा भय अवश्य पाया जाता है, क्योंकि इसका कारण एकमात्र मिथ्याभाव है । किन्तु इससे विपरीत सम्यग्दृष्टि के यह भय नहीं पाया जाता है क्योंकि इसके मिथ्याभाव का अभाव हो गया है ॥५१८॥
मिथ्यादृष्टि जीव अपनी आत्मा को नहीं पहिचानता है, क्योंकि वह एकमात्र मिथ्या भूमि में स्थित है । वह मूर्ख अपनी आत्मा को कर्म और कर्मफल
रूप ही अनुभव करता है ॥५१०॥
इसलिये भ्रमिष्ठ पुरुष के समान वह निरन्तर ही भयाक्रान्त रहता है । ठीक ही है क्योंकि अज्ञानी जीव मृग-तृष्णा में ही जल समझ बैठता है ॥५२०॥ किन्तु जो अन्तरात्मा है वह निर्भयपद को प्राप्त होने के कारण सदा ही निर्भीक है, क्योंकि भय की कारणभूत भ्रान्ति इसके नियम से नहीं पाई जाती हे ॥५२१॥
जो अन्य पदार्थ में किसी अन्य पदार्थ का ज्ञान होता है वह मिथ्या भ्रान्ति कहलाती है । जैसे कि अज्ञानी जीव अन्धकार के कारण रस्सी में सर्प का निश्चय हो जाने से डर कर भागता है वैसे ही मिथ्यादृष्टि भी मिथ्यात्व के कारण कर्म और कर्मफल में आत्मा का निश्चय कर लेने से डरता रहता है ॥५२२॥
किन्तु जो स्वसंवेदन-प्रत्यक्षरूपी ज्योति को अपने से अभिन्न जानता है वह कैसे डर सकता है, क्योंकि उसे ज्ञात रहता है कि कोई भी कार्य अन्यथा नहीं हो सकता है ॥५२३॥